शाम

चिड़ियों की चहक सहर…सवेरा… ले कर आती है.

 नीड़ को लौटते परिंदे शाम को ख़ुशनुमा बनाते हैं.

ढलते सूरज से रंग उधार लिए सिंदूरी शाम चुपके से ढल जाती.

फिर निकल आता है शाम का सितारा.

पर यादों की वह भीगी शाम उधार हीं रह जाती है,

भीगीं आँखों के साथ.

चोट का दर्द

कहते हैं चोट का दर्द टीसता है

सर्द मौसम में.

पर सच यह है कि

सर्द मौसम की गुनगुनी धूप,

बरसाती सूरज की लुकाछिपी की गरमाहट

या जेठ की तपती गर्मी ओढ़ने पर भी

कुछ दर्द बेचैन कर जाती हैं.

दर्द को लफ़्ज़ों में ढाल कर

कभी कभी ही राहत मिलती है.

स्याह स्याही

अब अँधेरे से डर नहीं लगता.

अँधेरा हीं रुहानी लगता है.

स्याह स्याही, सफ़ेद पन्नों पर कई

कहानियाँ, कवितायें लिख जाती हैं.

वैसे हीं अँधेरे की रोशनाई में कितने

सितारे, ख़्वाब, अफ़साने दिख जाते हैं.

जिसमें कुछ अपना सा लगता है .

 

आधा चाँद

आधे चाँद का दर्द

वही समझ सकता है,

जो आधा अधूरा होने

का एहसास जानता है.

चाँद जानता है

जल्दी ही वह पूरा हो कर आएगा .

भले हीं एक दिन के लिये हीं……

वह पूरा होने की जद्दो -जहद में

दस्तूर निभाता रहता है………

यह सोच कर कि उसका इंतज़ार

और सब्र काम आएगा।