हम सभी के पास
अपनी -अपनी कहानियाँ हैं…..
हम सब किसी ना किसी दौर से गुजरें हैं।
प्यार, नफरत, पसंद, नापसंद,
पछतावा दर्द , दुःख, खुशी……
जो शायद दूसरे ना समझें।
यह सब तो जीवन के रंग हैं।
जो हमें तोङने के लिये नहीं
जोङने के लिये होते हैं।
हम सभी के पास
अपनी -अपनी कहानियाँ हैं…..
हम सब किसी ना किसी दौर से गुजरें हैं।
प्यार, नफरत, पसंद, नापसंद,
पछतावा दर्द , दुःख, खुशी……
जो शायद दूसरे ना समझें।
यह सब तो जीवन के रंग हैं।
जो हमें तोङने के लिये नहीं
जोङने के लिये होते हैं।

Simat ke saari taakat lau jal uthi..
Khudi ko aajmane ki koshish mein..
Chiragon ne khudkushi kar li…!!
-Ashfaq
अपने आप से नाराजगी, शिकायतें
अपने आप से झगङा…..
क्यों हम करते हैं हर रोज़?
कभी अपने आप से प्यार अौर दोस्ती
करके तो देखिये।
अपने को माफ करके तो देखिये……
कितना सुकून मिलेगा।
इन दुनियावी रंगों , इत्रों, खुशबू, सुगंध से परे
कोई अौर भी राग-रंग, महक है ,
जो दिल और आत्मा को रंगती हैं
जीवन यात्रा में।
यह खुशबू हमें ले कर चलती रहती है,
प्यार भरे जीवन के अनन्त पथ पर।
तलवार अौर आघातों के
गहरे घावों को भरते देखा है।
पर ना दिखने वाले शब्दों के घावों
को ताउम्र कसकते देखा है।
शब्दों से किसी को नष्ट करना आसान है
पर कटु शब्दों के तासीर को
नष्ट करना नामुमकिन है।
खुद को ना खोने देना
अौरों को खुश करने की कोशिश में।
अपने को पाना
लोगों को खोने से अच्छा है।

उलझती जिन्दगी के तारों को सुलझाते हुए
बड़े बेज़ार हो नराजगी से कहा –
ऐ जिंदगी कभी तो मुस्कुराने दे
इन उलझनों से बाहर आने दे .
जवाब मिला – यही हैँ जिंदगी……
यह सब तो सबक हैँ
वर्ना तुझे शिकायत होगी मुझ से
कि कुछ सिखाया नहीँ .
यही हैँ जिंदगी ! ! ! ! ! !
जिंदगी थी खुली किताब,
हवा के झोकों से फङफङाती ।
आज खोजने पर भी खो गये
पन्ने वापस नहीं मिलते।
शायद इसलिये लोग कहते थे-
लिफाफे में बंद कर लो अपनी तमाम जिन्दगी,
खुली किताबों के अक्सर पन्नें उड़ जाया करते है ।
बरसात की हलकी फुहार
के बाद सात रंगों की
खूबसूरती बिखेरता इंद्रधनुष निकल आया।
बादलों के पीछे से सूरज की किरणें झाँकतीं
कुछ खोजे लगी….. बोली….
खोज रहीं हूँ – कहाँ से इंद्रधनुष निकला है ?
इंद्रधनुष की सतरंगी आभा खिलखिला कर हँसी अौर
कह उठी – तुम अौर हम एक हीं हैं,
बस जीवन रुपी वर्षा की बुँदों से गुजरने से
मेरे अंदर छुपे सातों रंग दमकने लगे हैं।
आसमान के बादलों से पूछा –
कैसे तुम मृदू- मीठे हो..
जन्म ले नमकीन सागर से?
रूई के फाहे सा उङता बादल,
मेरे गालों को सहलाता उङ चला गगन की अोर
अौर हँस कर बोला – बङा सरल है यह तो।
बस समुद्र के खारे नमक को मैंने लिया हीं नहीं अपने साथ।
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