खंडित आत्मा… रूह

एक अच्छी सज़ा दी लोगों ने.

कंधा ना दिया, जब ज़रूरत थी सहारे की.

अपनी खंडित आत्मा…. मन और रूह

को सम्भालते सम्भालते समझ आया.

कंधा मिलता नहीं चलती सांसों के साथ.

5 thoughts on “खंडित आत्मा… रूह

    1. शुक्रिया.
      इसका यह अर्थ है-
      जब हमें मदद या सहारे की ज़रूरत होती, तब शायद हीं कोई कंधा/सहारा देता है.
      पर दुनिया से गुज़रने के बाद चार लोग आ जाते हैं कंधा देने.
      अब कविता का अर्थ स्पष्ट है या नहीं? हो सके तो फिर से पढ़ कर देखिए और बताइए.

      Liked by 1 person

Leave a reply to Rekha Sahay Cancel reply