( मान्यता हैं कि वृंदावन , वाराणसी आदि में शरीर त्यागने से मोक्ष के प्राप्त होती हैं. इसलिये प्रायः इन स्थानों पर विधवायें आ कर सात्विक जीवन बसर करती हैं अौर अपने मृत्यु का इंतजार करती हैं। यहाँ इन्हें अनेकों बंधनों के बीच जीवन व्यतीत करना पड़ता हैं। इस वर्ष (2016) पहली बार होली खेलने के लिये कुछ मंदिरों ने अपने द्वार इन विधवाओं के लिये खोल दिये. )
वृंदावन और कान्हा की मुरली
सब जानते हैं।
वृंदावन की होली
सब जानते हैं।
पर वहाँ कृष्ण को याद करती
सफेदी में लिपटी विधवाओ की टोली
किसने देखी हैं ?
आज़ जब पहली बार
उन्हों ने खेली फूलों की होली।
सफेदी सज गई गुलाबो की लाली से
कहीँ बज उठी कान्हा की मुरली
उनकी उदास साँसो से।

Source: वृंदावन की वृध्द विधवाये ( कविता )
Images from internet.
Khubsoorat
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Shukriya.
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Welcome 😊
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Some of our systems are so cruel. I am glad that they were allowed to play the festival of colours.
Rekha, your poem gave a beautiful depiction of this💙
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True Radhika, why we are so insensitive ? Its good that some positive changes are taking place.
Thanks for the appreciation 😊
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I guess, man has become very self centered, and blindly continues to follow some age old traditions.
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yes, but some changes are taking place.
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Very miniscule. But at least that is a good beginning. 👍
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At least “change resisting ‘ trend is breaking. 😊😊
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Yes. That is a positive step 👍
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true. thanks a lot for sharing your views dear.
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Mostly are from West Bengal.
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Yes , you are right.
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बहुत सुंदर
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बहुत धन्यवाद।
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Again a beautiful poetry. You can bind your words to take heart of your readers.
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So sweet of you Preeti. Thanks for your lovely words dear.
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Shandar 🙂
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शुक्रिया।
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Dhanyvaad.😊
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nice one. Happy holi mam
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Thank you , same to you.
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Welcome mam
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Very nice poem|👌👌
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Thankyou.
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बाँके बिहारी जी के मंदिर के बाहर भीख मांग कर अपनी दैनिक जरूरतो को पूरा करती हुयी विधवाओं को देखकर मन खराब हो जाता है । सही मे यहाँ हमारे समाज की क्रूरता ही दिखती है ।विधवाओं की खुशी का अच्छा प्रयास , जिसे आपने अपने शब्दो से सुन्दर तरीके से प्रस्तुत किया 😊
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हाँ , यह बड़ा अजीब प्रचलन रहा है. जिसे बदल जाना चहिये. पति के जाने की सजा क्यों मिलती है ? दुनिया तरक्की कर रहीं है पर इन मामलों में हम अभी भी कम संवेदनशील है.
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हमारे राजस्थान की परंपरा अलग रही है, लेकिन किसी प्रथा को जबरदस्ती किसी के ऊपर थोपना गलत बात है ।ये सारी बातें मुख्य तौर पर शिक्षा पर निर्भर करती है कुछ हद तक भावनाओं पर भी , ये महिला की अपनी सोच पर निर्भर करता है ।
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अच्छा आप राजस्थान से है , खूबसुरत जगह है 😊
शिक्षा और सोंच तो है. पर यह दरअसल विधवा महिलाओ को भार और दुर्भाग्यशाली मानने से भी जुड़ा है.
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प्रशंसा के लिये आभार.
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मै राजस्थान से नही हूँ लेकिन वहाँ से प्रभावित हूँ ।आपकी बातों से सहमत हूँ😊
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मुझे अक्सर ख्याल आता है कि क्या हमारे यहाँ ऐसी दुनिया बनेगी जहाँ महिलाएँ और लड़कियाँ मजबूत, सुरक्षित, शक्तिशाली होगीं?
शायद नई युवा पीढ़ी इस तरह के बदलाव को लाये।
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जरूर बनेगी 😊
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हाँ विश्वास पर दुनिया कायम है. धन्यवाद 😊
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#Excellent लाजबाब
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Dhanyvaad.
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Behtreen mam 😊😊
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Bahut dhanyvaad Sapna 😊😊
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Beautiful. Just beautiful. I don’t have more words to say for your expression.
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Thanks a lot 😊😊😊
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अच्छा लगा ये जान कर की विधवा महिलाओं को भी रंगों का पर्व मनाने की पहल की गयी
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हाँ यह खुशी की बात है। मुझे यह बात कभी समझ नहीं नहीं आई कि विधवा महिलाओं की गलती क्या है? उन्हें हर शुभ कार्य से अलग क्यों रखा जाता है?
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इंसान की फितरत है.. रावण को पूरा जहान घूमने मिलता है और सीता को अपनी पवित्रता साबित करने के लिए लक्ष्मण रेखा में रहना पड़ता है या फिर अग्निपरीक्षा देनी पड़ती है।
पुरुष प्रधान समाज के नियम हैं.. ये साबित करने के लिए की हम श्रेष्ठ हैं.. पर अब वक़्त बदल रहा है और ये सच में ख़ुशी की बात है
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तुमने सही कहा। इस पुरुष प्रसाद प्रधान समाज में ऐसे अनेक विरोधाभास है, लेकिन ऐसी गलतियों में पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं का भी समान हाथ रहता है। अब समय बदल रहा है और बदलना भी चाहिए। जिस से माहिलाअों अौर लङकियों को समान सम्मान मिल सके।
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महिलाओं को पढ़ने/लिखने की आज़ादी ही कहाँ है.. उन्हें जो बताया गया वही उनका जीवन बन गया। हैरत की बात ये है कि वेदों में महिलाओं की एजुकेशन पर ख़ासा जोर दिया गया है.. और ये एक बहुत बड़ी वजह है के आज भी कुछ प्रजातियां महिलाओं की पढ़ाई के ख़िलाफ़ हैं
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तुम से बातें करना मुझे अच्छा लगता है। साफ बातें करती हो अौर लिखती भी बहुत अच्छा हो।
समाज के इस चलन के बारे में एक बात बताऊं तुम्हें? समाज में हो रहे भेदभाव लड़कियों को झेलना पड़ता है। उसका लाभ या हानि सिर्फ लड़कियाँ नहीं झेलती है , बल्कि बहुत अधिक घाटा समाज को भी होता है। एक और तो लड़कियों को चांद पर भेज रहे हैं और दूसरी और इतना भेदभाव करते हैं। खुद ही सोचो।
वैदिक काल शायद आज से अच्छा था।
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😊 मुझे भी आप जैसे सुलझे लोगों से बात करना पसंद है।
वैदिक काल बहुत अच्छा था मैम.. युग बदला और मनुष्य की मानसिकता भी बदली.. एक वर्ग ने दूसरे वर्ग को दबाना शुरू किया.. वो कहते हैं न रबर को एक हद तक ही खिंचा जा सकता है। शायद इसी खिंचा तानी से सतयुग-त्रेतायुग-द्ववापर्युगौर कलयुग का निर्माण हुआ अब ये चक्र उल्टा भी तो चलेगा
आप लिखते रहिये अच्छा लगता है आपको पढ़ना
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तुम्हारी बाते सही है. चक्र तो कब उल्टा चलेगा मालूम नहीँ. इसलिये अपनी बाते यहाँ लिखती रहती हूँ. लिखना मेरे लिये आज के समय में उतना ही ज़रूरी बन गया है जितना कोई और Imp काम.
तारीफ के लिये शुक्रिया , 😊😊
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अच्छा है.. लिखना चाहिए.. विचारों के बहाव से कई बार रस्ते निकल आते हैं.. शायद आपका लिखा किसी के जीवन को दिशा दे जाये 😊🙏
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बहुत धन्यवाद सुप्रिया.
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apnea link bhejna . tumhara blog mai padh nahi pa rahi hun.
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https://wordographyofasacredheart.wordpress.com
😊🙏
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Thanks a lot.
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😊🙏
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😊😊
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Dil ko chhoo lene wali rachana! Bahut khoob!
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bahut dhanyvad Savita.
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कृष्ण भक्ति से सुसज्जित लेखिनी
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जी , साथ ही महिलाओं की सामजिक स्थिति भी दर्शाने की कोशिश है.
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हा आपकी सामाजिकता धार्मिकता से परिपूर्ण है।
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जी , मैं कृष्ण भक्त हूँ और कहते है कृष्ण को अहंकार से नहीँ पाया जा सकता है.
शायद इसलिये मेरी धार्मिकता भी सामाजिकता के रुप में…..है.
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this time i am speechless
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Its nice of you. Thanks a lot.
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मैंने आपके ब्लॉग को follow करने की कोशिश की , पर अपने आप unfollow हो जाता है.
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give me some time for updating
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Now its ok. I tried again n succeeded. 😊😊
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It is so kind and thoughtful of you to remember them. And remind us of their existence.
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Thanks A lot for paying attention. There are many such issues in our society which need reform.
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Pretty. This kind of a social revolutions is the need of the hour. Every year around holi I make it a point, to look for pictures of the widows from Vrindavan.
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True buddy. thank you so much !
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Kind of shocking! Are we still living in bygone era? Why can’t they rebel and be a part of all the festivals in the society?
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They are weaker section of our society. They don’t have courage to stand up for their rights.
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Nicely captured state and status of ageing widows of Vrindaban.
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Thank you so much.
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विधवाओं की दुर्दशा पर आपने अच्छा प्रकाश डाला है। यह हमारे समाज में व्याप्त एक बुराई है जिसका विरोध हम सभी को करना चाहिए तभी यह बुराई हमारे समाज से समाप्त होगी। असल में जब तक हम स्वयं ऐसी बुराइओं का विरोध नही करेंगे तब तक ये सारी कुप्रथाएँ हमारे समाज में बनी रहेंगी।
यह हमारा अंधविश्वास है कि किसी ख़ास जगह पर मरने से स्वर्ग मिलता है। जब तक हम अपने अंदर से ऐसे मूर्खतापूर्ण अंधविश्वासों को समाप्त नही करेंगे तब तक समाज में ऐसी ही कई बुराइयां और कुप्रथाएँ चलती रहेंगी।
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आपकी बाते बहुत अच्छी लगी. काश और लोग भी इतनी सकरात्मक सोच रखी. यह अंधविश्वास तो है , साथ साथ इन महिलाओं को बोझ समझने के कारण भी ऐसा होता है.
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जी हाँ आपका कहना बिलकुल सही है
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आपने मेरे काफी पोस्ट पोस्ट पढ़े और अपने बिचार लिखे है. मुझे अच्छा लगा. बहुत धन्यवाद.
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☺
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वृन्दावन की विधवाएं किसी सुधारक या नेता को नज़र नही आतीं।वोटबैंक नही हैं।लगभग 38000 की संख्या में हैं।अच्छा लगा आपकी कविता में उन्हें पाकर नही तो वो कहीं नहीं हैं।
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आपने अच्छा किया आंकड़े बता कर. ना जाने कितने तीर्थों में मोक्ष की बाट जोहती और कितनी ऐसी परित्यक्त महिलायें होंगी. मैने अनेकों तीर्थ स्थलों पर इन्हे देखा है.
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तीन तलाक़ को मीडिया में सिर्फ इसीलिये प्राथमिकता मिल रही है क्योंकि इससे राजनैतिक दलों के हित सधते हैं।भारत में विधवाओं के साथ जो अमानवीय बर्ताव होता है वो किसी को नहीं दिखता। छोटी उम्र की लड़की की बड़ी उम्र वाले के साथ शादी होना इसका मुख़्य कारण है।इसके अलावा सम्पत्ति में हिस्सेदारी न देनी पड़ी ये भी कारण है।गरीबी और सामाजिक भेदभाव के अलावा HIV जैसी बिमारियों के कारण विधवा हुई महिलाएं भी वृन्दावन में रहती हैं।कई बार तो ये परिवार द्वारा किये जाने वाले शारीरिक और मानसिक शोषण से बचने स्वयं यहाँ आ जाती हैं।यहाँ भी सिर्फ ये जिन्दा ही रह पाती हैं ,जी नहीं पाती।आप सही कह रही हैं सभी तीर्थ स्थानों और शहरो में ये भगवान के सहारे जी रही हैं जहाँ इनका शारीरिक शोषण भी होता है कभी समाज के ठेकेदारो के द्वारा कहीं पंडा पुजारियों के द्वारा।
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आपने इस विषय पर इतने विस्तार में बात किया। यह खुशी की बात है वरना महिलाओं की स्थिति खास करके ऐसी महिलाओं की स्थिति जो बेसहारा है उनके बारे में कम ही सोचा जाता है ।मालूम नहीं यह स्थिति कब सुधरेगी। मैंने 2001 में महिलाअों पर शोध किया था। आज भी महिलाओं की स्थिती में ज्यादा बदलाव नहीं दिखता है ।मैं सामान्य महिलाओं की बात कर रही हूं । वह समाज का की आधे हिस्से की भागीदार हैं यानी लगभग 50% है।
ये तो परित्यक्त और कमजोर हैं अगर इनके लिए कुछ कानून बनेगा तभी इन्हें मदद मिल सकती है मैंने अपने परिवार में अपने बचपन में किसी को बाल विधवा के रुप में पूरी जिंदगी ऐसे काटते देखा है ।जो अफसोस की बात है।
राजनैतिक मुद्दों से मुझे कम लगाव है क्योंकि इन्हें कम हीं काम करते देखा है। आज धर्म का हाल भी कुछ ऐसा हीं होता जा रहा है।
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http://wp.me/p7DHVX-3p
मैंने भी महिलाओं की दशा पर कुछ लिखा है। मैं अभी HIV पीडितो के लिये काम कर रहा हूँ।रोज़ दो-चार होता हूँ जीवन के असली सच्चाई से जो बहुत भयावह है। निर्भया काण्ड के दौरान मेरी बहस उन पढे-लिखे (तथाकथित) लोगो ( महिला, पुरुष दोनों) से होती रहती थी जो लड़की की ही मानते रहे अन्त तक।ऐसा है हमारा समाज। जहाँ बचपन से ही बच्चे के सामने महिलाओं के यौनांगों को वीभत्स रूप से (गाली के माध्यम से) प्रस्तुत किया जाता है जो समाज में स्वीकार्य है।पर महिला का घर से निकलना स्वीकार्य नहीं।इस स्थिति के लिये पुरुष और महिलाएं दोनों जिम्मेदार हैं।
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आपका यह मेसेज स्पैम में चला गया था। अभी नजर पङी। आप HIV पीडितो के लिये कहाँ काम कर रहे हैं? यह अच्छा अच्छी है। महिलाअों को सम्मान व समान दर्जा मिले तभी देश की अपेक्षित तरक्की संभव है।
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Delhi me hi..
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ok.
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