बरसात में बिन बोए भी
कुकुरमुते निकल आते है,
वैसे ही जैसे बिन बुलाए बरस जाते है बादल .
पहाड़ों में दी आवाज़ें भी
गूँज बन लौट आती है वापस.
फिर क्यों कभी – कभी ,
किसी किसी को बुलाने पर भी जवाब नहीं आता ?
कहाँ खो जाती है ये सदाये…… ये पुकार …… ये लोग ?

बरसात में बिन बोए भी
कुकुरमुते निकल आते है,
वैसे ही जैसे बिन बुलाए बरस जाते है बादल .
पहाड़ों में दी आवाज़ें भी
गूँज बन लौट आती है वापस.
फिर क्यों कभी – कभी ,
किसी किसी को बुलाने पर भी जवाब नहीं आता ?
कहाँ खो जाती है ये सदाये…… ये पुकार …… ये लोग ?

बरसात की हलकी फुहार
के बाद सात रंगों की
खूबसूरती बिखेरता इंद्रधनुष निकल आया।
बादलों के पीछे से सूरज की किरणें झाँकतीं
कुछ खोजे लगी….. बोली….
खोज रहीं हूँ – कहाँ से इंद्रधनुष निकला है ?
इंद्रधनुष की सतरंगी आभा खिलखिला कर हँसी अौर
कह उठी – तुम अौर हम एक हीं हैं,
बस जीवन रुपी वर्षा की बुँदों से गुजरने से
मेरे अंदर छुपे सातों रंग दमकने लगे हैं।
हमारे अंदर भी क्या बदलते मौसम हैं ?
क्या कभी बसंत अौर कभी पतझङ होते हैं ?
कभी कभी सुनाई देती है गिरते पत्तों की उदास सरसराहट
या शरद की हिम शीतल खामोशियाँ
अौर कभी बसंत के खिलते फूलों की खुशबू….
ऋतुअों अौर मन का यह रहस्य
बङा अबूझ है………
हम समझते हैं कि
हम सब समझते हैं।
पर ऊपर बैठ,
जो अपनी ऊँगलीं के धागे से
हम सबों को नचा रहा है कठपुतली सा।
उसे हम कैसे भूल जाते हैं?
कालरात्रि सा सघन अँधेरा ,
आता है जीवन में हर रोज़ .
पर
आकाश के एक एक कर
बूझते सितारे,
करते है सूरज
औ भोर की
किरणों का आगाज …..
बस याद रखना है –
हर रात की होती है
सुहानी भोर !!!
हाथ पकङना साथ नहीं होता
हाथ छूटना , संबंध टूटना नहीं होता।
अकेले रिश्ते निभाये नहीं जाते,
जैसे एक हाथ से ताली बजाई नहीं जाती।
एक दूसरे के लिये इज़्जत और ईमानदारी हो तो
रिश़्तों का निभाना अौर निभना
अपने आप हो जाता है……
वह सफेद लिबास में, सफेद गुलदस्ते सी थी,
घर वालों को चाहिये थी लाली वाली दुलहन।
यह शादी, मैरेज अौर निकाह के बीच का फासला
प्रेम, इश्क, लव व इबादत
सब कुछ तोङ गई।
जिस राह पर हर बार मुझे
अपना कोई छलता रहा ।
फिर भी ना जाने क्यों मैं
उसी राह ही चलता रहा।
सोंचा इस बार….
रौशनी नहीं धुआँ दूँगा।
लेकिन चिराग था फितरत से,
जलता रहा..
जलता रहा……
Anonymius
जिंदगी के सफर में
सारे इम्तहान हमारे हीं हिस्से क्यों?
नतीज़े आये ना आये ,
अगला पर्चा शुरु हो जाता है
हमने तो जिंदगी को कभी ना जाँचा ना परखा ना इम्तहान लिया,
फिर यह क्यों रोज़ नये इम्तहान लेती, परखती रहती है?
सोने की तरह कसौटी पर कस कर अौर कभी
पत्थर पर घिस कर हिना बना हीं ङालेगी शायद।
कहते हैं
रंग लाती है हिना पत्थर पर घिस जाने के बाद ……..
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