
चमक उठी सन् सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
सुभद्राकुमारी चौहान
Lakshmi Bai / Laxmi Bai, birth date
November 19, 1835, Kashi, India.

चमक उठी सन् सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
सुभद्राकुमारी चौहान
Lakshmi Bai / Laxmi Bai, birth date
November 19, 1835, Kashi, India.
इश्क़ है जागती रातें, उनींदी आँखें, गुनगुनाते गीत।
मुहब्बत है ख़्वाब, सितारे, चिराग़, चाँद
अँधेरी रातें, अधूरा चाँद, अधूरे किस्से।
इस इश्क़ को हीं कहते हैं बंदगी।
हम तो जी रहे हैं यही ज़िन्दगी।
तुम एक बार में लगे टूटने?
हँस कर पूछा चाँद ने।

नहीं थी उनको हमारी कदर,
जिसके हम थे सबसे बड़े कदरदान।

हमारी कदर नहीं थी उनको,
जिसके हम सबसे बड़े कदरदान थे।

इक तन्हा चराग़, कमजोर पड़ते लौ से
निशा के गहरे अँधेरे से लड़ता थक सा गया।
रात के आख़री किनारे पर
टिमटिमाते चराग़ के कानों में,
सहर का सितारा बोल पड़ा –
हौसला रख, सुबह के दीप।
कुछ हीं पल में अँधेरा जाने वाला है।
रौशन जहाँ करने,
आफ़ताब आने हीं वाला है,
किसी से मिलते हीं
उसे ना नापो तौलो,
जज ना करो।
सभी किसी ना किसी रूप में पूर्ण हैं
और अपूर्ण भी।
इंसान रूप में ईश्वर ने अवतार लिया,
यही समझाने के लिए,
कि कोई परफ़ेक्ट नहीं।



खोने का डर क्यों? साथ क्या लाए थे।
क्या कभी बिना डरे जीने कोशिश की?
तब तो फ़र्क़ समझ आएगा।
इस जहाँ में आए, सब यहाँ पाए।
सब यही छोड़ जायें।
यही कहती है ज़िंदगी।
ग़र जीवन का अर्थ खोजना है।
एक बार ज़िंदगी की बातें मान
कर देखने में हर्ज हीं क्या है?
Topic by yourQuote

दहलीज़ यूँ हीं नहीं बनते।
ये मकाँ को घर है बनाते।
घर की हिफ़ाज़त है करते।
इस कदर होतें है पैबस्त ये
चौखट दिल-औ-दिमाग़ में
कि दाख़िल होते एक से दूसरे दरवाज़े में,
नई सोंच आती है दिमाग़ में।
दिल की दहलीज़ हो या घर की।
ये कुछ बातें याद दिलाती है,
कुछ बातें भुलातीं है।
About doorway effect Psychologists says – walking through a door and entering another room creates a “mental blockage” in the brain. walking through open doors resets memory to make room for a new episode to emerge. That’s is why you sometimes walk into a “room and forget why you entered

गुमनाम अधूरी ग़ज़लों को
मुकम्मल क़ाफ़िया मिल जाए।
तो उनकी सफ़र पूरी हो जाए।

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