आँखें ख़्वाब, औ सपने बुनतीं हैं….

आँखें ख़्वाब, औ सपने बुनतीं हैं,

हम सब बुनते रहते हैं,

ख़ुशियों भरी ज़िंदगी के अरमान।

हमारी तरह हीं बुनकर पंछी तिनके बुन आशियाना बना,

अपना शहर बसा लेता है.

बहती बयार और समय इन्हें बिखेर देते हैं,

यह  बताने के लिये कि… 

 नश्वर है जीवन यह।

मुसाफिर की तरह चलो। 

यहाँ सिर्फ रह जाते हैं शब्द अौर विचार। 

वे कभी मृत नहीं होते।

जैसे एक बुनकर – कबीर के बुने जीवन के अनश्वर गूढ़ संदेश। 

 

 

बुनकर पंछी- Weaver Bird.

ज़िंदगी के रंग- 199

ज़िंदगी की परेशान घड़ियों में अचानक

किसी की बेहद सरल और सुलझी बातें

गहरी समझ और सुकून दे जातीं हैं, मलहम की तरह।

किसी ने हमसे कहा – किसी से कुछ ना कहो, किसी की ना सुनो !

दिल से निकलने वाली बातें सुनो,

और अपने दिल की करो।

गौर से सुना,  पाया……

दिल के धड़कन की संगीत सबसे मधुर अौर सच्ची है।

 

ज़िंदगी के रंग – 198

दुनिया में सुख हीं सुख हो,

सिर्फ़ शांति हीं शांति और ख़ुशियाँ हो.

ऐसा ख़ुशियों का जहाँ ना खोजो.

वरना भटकते रह जाओगे.

जीवन और संसार ऐसा नहीं.

कष्ट, कोलाहल, कठिनाइयों से सीख,

शांत रह कर जीना हीं ख़ुशियों भरा जीवन है……

ज़िंदगी के रंग – 197

जीवन के संघर्ष हमें रुलातें हैं ज़रूर,

लेकिन दृढ़ और मज़बूत बनातें हैं.

तट के पत्थरों और रेत पर

सर पटकती लहरें बिखर जातीं हैं ज़रूर.

पर फिर दुगने उत्साह….साहस के साथ

नई ताक़त से फिर वापस आतीं हैं,

नई लहरें बन कर, किनारे पर अपनी छाप छोड़ने.

पीड़ा का आकार

अक्सर सुना था,

दर्द भी रचना बन सकती है.

जाना एक दिन.

जब अंतर्मन से लावा सी बहती-पिघलती

पीड़ा को आकार में ढलने दिया.

सामने खड़ी मिली एक भावपूर्ण कविता.

नीलकंठ

जंग लगी कुंजियों से

रिश्तों के सुप्त तालों को

खोलने की कोशिश में

ना जाने कितने नील गरल

निकलते हैं इस सागर से.

इन नील पड़े चोट के निशान

दिखती नही है दुनिया को,

शिव के नीलकंठ की तरह.

पर पीड़ा….दर्द बहुत देती हैं.

आग का दरिया

नासमझी…नादानी क्या बया करे समझदारों की?

जंगल…धरा तो जल हीं रहें हैं.

दुनिया ने तरक़्क़ी इतनी कर ली नदी …पानी पर भी आग लगा दी.

अपने घर में आग लगे, दो पल भी बर्दाश्त नहीं.

बेज़ुबान जलचरों का घर- नदियाँ जलती रहें, चिंता नहीं.

यह समझदारी समझ नहीं आती.

Assam river burns for two days after crude oil spillage

https://www.google.co.in/amp/s/www.thehindu.com/news/national/other-states/assam-river-on-fire-for-two-days-after-crude-oil-spillage/article30724994.ece/amp/

एक ख़्याल

एक ख़्याल अक्सर आता है.

एक रहस्य जानने की हसरत होती है.

क्या सोंच कर ईश्वर ने मुझे इस आकार में ढाला होगा?

कुछ तो उसकी कामना होगी जो यह रूह दे डाला होगा.

क्यों इतने जतन से साँचे में मूर्ति सा गढ़ा होगा?

क्या व्यर्थ कर दिया जाए इसे दुनियावी उलझनों …खेलों में?

या ढूँढे इन गूढ़ प्रश्नों के उत्तरों को,

अस्तित्व के गलने पिघलने से पहले?

सूरज ङूब गया

जीवन की शाम हो चली थी,

थका-हारा सूरज झुका,

थोङा रुका

….गुफ्तगु के इरादे से या

शायद फिर से आने का

वायदा करना चाहता था धरा से।

पर तभी छा गये बीच में काले बादल।

अौर बिना रुके…..

बिना कुछ कहे सूरज ङूब गया,

कभी नहीं वापस आने को।

लोग

एक नरम मुलायम धूप

हौले हौले चलती कांच के दरवाजे से

गुजर कर पैरों तक आ गई.

गुनगुनी सी धूप सर्द मौसम में

नरम रजाई सी तलवों को ढक कर सुकून देने लगी .

कुछ ही देर में धूप की तेज़ होती गरमाहट चुभने लगी ।

कुछ लोग भी ऐसे होते हैं,

शुरू में नरम और बाद में चुभने वाले।