नासमझी…नादानी क्या बया करे समझदारों की?
जंगल…धरा तो जल हीं रहें हैं.
दुनिया ने तरक़्क़ी इतनी कर ली नदी …पानी पर भी आग लगा दी.
अपने घर में आग लगे, दो पल भी बर्दाश्त नहीं.
बेज़ुबान जलचरों का घर- नदियाँ जलती रहें, चिंता नहीं.
यह समझदारी समझ नहीं आती.

नासमझी…नादानी क्या बया करे समझदारों की?
जंगल…धरा तो जल हीं रहें हैं.
दुनिया ने तरक़्क़ी इतनी कर ली नदी …पानी पर भी आग लगा दी.
अपने घर में आग लगे, दो पल भी बर्दाश्त नहीं.
बेज़ुबान जलचरों का घर- नदियाँ जलती रहें, चिंता नहीं.
यह समझदारी समझ नहीं आती.

एक ख़्याल अक्सर आता है.
एक रहस्य जानने की हसरत होती है.
क्या सोंच कर ईश्वर ने मुझे इस आकार में ढाला होगा?
कुछ तो उसकी कामना होगी जो यह रूह दे डाला होगा.
क्यों इतने जतन से साँचे में मूर्ति सा गढ़ा होगा?
क्या व्यर्थ कर दिया जाए इसे दुनियावी उलझनों …खेलों में?
या ढूँढे इन गूढ़ प्रश्नों के उत्तरों को,
अस्तित्व के गलने पिघलने से पहले?

जीवन की शाम हो चली थी,
थका-हारा सूरज झुका,
थोङा रुका
….गुफ्तगु के इरादे से या
शायद फिर से आने का
वायदा करना चाहता था धरा से।
पर तभी छा गये बीच में काले बादल।
अौर बिना रुके…..
बिना कुछ कहे सूरज ङूब गया,
कभी नहीं वापस आने को।
एक नरम मुलायम धूप
हौले हौले चलती कांच के दरवाजे से
गुजर कर पैरों तक आ गई.
गुनगुनी सी धूप सर्द मौसम में
नरम रजाई सी तलवों को ढक कर सुकून देने लगी .
कुछ ही देर में धूप की तेज़ होती गरमाहट चुभने लगी ।
कुछ लोग भी ऐसे होते हैं,
शुरू में नरम और बाद में चुभने वाले।
सूर्य दक्षिण जा बैठा और सर्द मौसम ने चादर फैला लिया. अब सूरज उत्तर की यात्रा पर निकला है, कर्क से मकर की ओर. अब रातें छोटी और दिन लम्बी होगी. सूर्य की गुनगुनी धूप में आकाश रंग-बिरंगी पतंगो से जगमगा उठेगा. नदियों-तीर्थों पर उपासक प्रकृति के सम्मान में सूर्य को नमन करेंगे. जीवन नव धान्य, गुड-तिल के माधुर्य से भर जाएगा.
मान्यता है कि काले रंग की साड़ी और मृग चर्म की कंचुकी, नीलम का आभूषण, अर्क पुष्प की माला धारण किए हुए “संक्रांति” आती है, जो सुख सम्पन्नता का प्रतीक है. मानव जीवन के आधार – प्राकृतिक को, कृतज्ञता अर्पित करते इस पावन त्योहार पर आप सबों को हार्दिक शुभकामनाएं!!
भास्करस्य यथा तेजो मकरस्थस्य वर्धते।
तथैव भवतां तेजो वर्धतामिति कामये।।
मकरसंक्रांन्तिपर्वणः सर्वेभ्यः शुभाशयाः।



सतह तनाव- surface tension
ज़िंदगी कट गई भागते दौड़ते.
थोड़ा रुककर कर,
ठहर कर देखा – चहचहातीं चिड़ियों को,
ठंड में रिमझिम बरसती बूँदे,
हवा में घुली गुलाबी ठण्ड……
खुशियाँ तो अपने आस-पास हीं बिखरीं हैं,
नज़रिया और महसूस करने के लिए फ़ुर्सत….
वक़्त चाहिए.

बहते बहते उम्र के बहाव में,
ज़िंदगी के बदलते पड़ाव में,
हर किसी को ज़िंदगी में,
उन्हीं कहानियों का सामना करना पड़ता है,
जो सनातन काल से शाश्वत है.
ज़िंदगी क्षण भंगुर है –
यह जानते हुए भी उलझ जातें हैं माया मोह में.
और जब यह मायावी स्वप्न टूटता है,
तब ख़्याल आता है – मृत्यु तो सब की आती है.
पर जीवन जीना कितने लोगों को आता है?

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