नीलकंठ

जंग लगी कुंजियों से

रिश्तों के सुप्त तालों को

खोलने की कोशिश में

ना जाने कितने नील गरल

निकलते हैं इस सागर से.

इन नील पड़े चोट के निशान

दिखती नही है दुनिया को,

शिव के नीलकंठ की तरह.

पर पीड़ा….दर्द बहुत देती हैं.

आग का दरिया

नासमझी…नादानी क्या बया करे समझदारों की?

जंगल…धरा तो जल हीं रहें हैं.

दुनिया ने तरक़्क़ी इतनी कर ली नदी …पानी पर भी आग लगा दी.

अपने घर में आग लगे, दो पल भी बर्दाश्त नहीं.

बेज़ुबान जलचरों का घर- नदियाँ जलती रहें, चिंता नहीं.

यह समझदारी समझ नहीं आती.

Assam river burns for two days after crude oil spillage

https://www.google.co.in/amp/s/www.thehindu.com/news/national/other-states/assam-river-on-fire-for-two-days-after-crude-oil-spillage/article30724994.ece/amp/

एक ख़्याल

एक ख़्याल अक्सर आता है.

एक रहस्य जानने की हसरत होती है.

क्या सोंच कर ईश्वर ने मुझे इस आकार में ढाला होगा?

कुछ तो उसकी कामना होगी जो यह रूह दे डाला होगा.

क्यों इतने जतन से साँचे में मूर्ति सा गढ़ा होगा?

क्या व्यर्थ कर दिया जाए इसे दुनियावी उलझनों …खेलों में?

या ढूँढे इन गूढ़ प्रश्नों के उत्तरों को,

अस्तित्व के गलने पिघलने से पहले?

सतह का तनाव

पानी के क़तरे में चींटी को देखा क़ैद,

सतह तनाव को ना तोड़ पाने से,

एक बड़ी सी जल बूँद के अंदर.

ऐसे हीं क़ैद हो जातें है,

हम भी यादों के क़ैद में.

लगता है, दुनिया में हो कर भी नहीं हैं

और कभी नहीं तोड़ पाएँगे

इस कमज़ोर पारदर्शी बुलबुले के क़ैद को….

सतह तनाव- surface tension

चराग़-ए-रहगुज़र

रहगुज़र पर, दूसरों को

इतना भी राह ना दिखाओ.

कि अपनी हीं राह…….

अपनी ही मंज़िल भूल जाओ.

चराग़-ए-रहगुज़र खड़े

रह जाते हैं राहों में.

और कारवाँ ….राही…. गुज़र जातें हैं.

 

अर्थ –

चराग़-ए-रहगुज़र- lamp on the way.

रहगुज़रpath, road.

ज़िंदगी के रंग -168

चाय की प्यालियाँ भी

हमसफ़र और दोस्त हैं,

आने जाने वाले पलों कीं.

कई पल गुज़रे हैं ज़िंदगी के

तुम्हारे और चाय की प्याली के साथ

कभी फीकी, कभी मीठी,

कभी सोन्धी-सोन्धी सी !!

मेहंदी के रंग से लम्हे

जो सिर्फ़ अपनी ख़ुशबू छोड़ गए, काश़ वे लम्हें

मेहंदी के रंगों की तरह हथेलियों में रच बस जाते.