अतीत की स्मृतियों का बोझ दम घोटने लगता है . अौर उनमें जीने की चाहत भी होती है।
यह कोशिश, कुछ ऐसी बात है जैसे – आँधियाँ भी चलती रहें, और दिया भी जलता रहे..।
William Wordsworth was spot on when he said “Poetry is the spontaneous overflow of powerful feelings: it takes its origin from emotion recollected in tranquility.” When my pen meets the paper, it always captures the many moods and their wild swings and emotions and their detours which overflows from my heart spontaneously into the paper transmogrifying into verses!!
अतीत की स्मृतियों का बोझ दम घोटने लगता है . अौर उनमें जीने की चाहत भी होती है।
यह कोशिश, कुछ ऐसी बात है जैसे – आँधियाँ भी चलती रहें, और दिया भी जलता रहे..।
सँवरी, ग़ज़ल सी ज़िंदगी जीने की हसरतें
किसकी नहीं होती? अौर, जो मिला है वही ग़ज़ल है।
यह समझते समझते ज़िंदगी निकल जाती है.

अब अँधेरे से डर नहीं लगता.
अँधेरा हीं रुहानी लगता है.
स्याह स्याही, सफ़ेद पन्नों पर कई
कहानियाँ, कवितायें लिख जाती हैं.
वैसे हीं अँधेरे की रोशनाई में कितने
सितारे, ख़्वाब, अफ़साने दिख जाते हैं.
जिसमें कुछ अपना सा लगता है .

टिमटिमाते तारे, जगमगाते जुगनू, दमकता चाँद , नन्हें दीपक की हवा से काँपती लौ, सभी अपनी पूरी ताक़त से रात के अंधेरे का सामना करते हैं. फिर हम क्यों नहीं कर सकते सामान ? सहर तो होगी हीं….सूरज तो निकलेगा हीं….

एक प्रश्न अक्सर दिलो-दिमाग में घूमता है.
एक शिशु जहाँ जन्म लेता है। जैसा उसका पालन पोषण होता है।
वहाँ से उसके धर्म की शुरुआत होती है।
जो उसे स्वयं भी मालूम नहीं।
तब कृष्ण के नृत्य – ‘रासलीला’,
सूफी दरवेशओं के नृत्य ‘समा’ में क्यों फर्क करते हैं हम?
ध्यान बुद्ध ने बताया हो या
कुंडलिनी जागरण का ज्ञान उपनिषदों से मिला हो।
क्या फर्क है? और क्यों फर्क है?
ब्रह्मांड में बिन आधार गोल घूमता नीलम-पन्ना सा, नीले जल बिंदु सा, यह पृथ्वी, हमारी धरा, हमारा घर है। यह वह जगह है, जहाँ हम सब जीते-मरते और प्यार करते हैं। यह हमारे अस्तित्व का आधार है। हर व्यक्ति जो कभी था जो कभी है । सभी ने यहीं जीवन जिया। हमारा सुख-दुख, हमारा परिवार, हजारों धर्म, आस्थाएँ, महान और सामान्य लोग, हर रिश्ता , हर प्रकार का जीवन, हर छोटा कण, ब्रह्मांड में बिना सहारे घूमती इस अलौकिक पृथ्वी के रंगभूमि का हिस्सा है।
फिर इसकी उपेक्षा क्यों ? ना जाने कितने महिमामय रजवाड़े, शासकों ने मनमानी की, बिखेरे रक्त की बूंदें। क्या यह उनका यह क्षणिक आत्मा महिमा, एक भ्रम नहीं था? क्या बिन इस धरा के, इस विशाल विश्व के उनका अस्तित्व संभव था?
हमारी विशाल धरा, ब्रह्मांड के अंधकार में जीवन से पुर्ण, नाचती एक मात्र स्थान है। क्या है ऐसी कोई आशा की किरण जो हमें जीवन का आधार दे सके? जो परीक्षा की घड़ी में मददगार हो? आज यह पृथ्वी एकमात्र ज्ञात जीवन से परिपूर्ण दुनिया है। फिर क्या यह अच्छा नहीं है कि हम इसका सम्मान करें? नफरत छोड़कर प्रेम से जिये और जीने दें सभी को?

दुनिया की महफ़िलों से सीखने को कोशिश में हैं
दुनियादारी के क़ायदे और
इस दुनिया के शोर शराबे, कोलाहल के बीच,
मन और आत्मा में शांति बनाए रखने की रीत.

किस से शिकायत करें?
सिर पटका दर-ए-ख़ुदा पर.
ईश्वर के आगे .
कहीं सुनवाई नहीं हुई .
ना जाने कहाँ भूल हुई ?
भूलना चाह कर भी भूल नहीं सकते.
कहते हैं नियति बदली नहीं जा सकती.
पर हमें तो था वहम …..
हाथ पकड़ कर जगा लेने का
वहम, भ्रम और ग़रूर

Painting courtesy- Lily Sahay
साँस के साथ बुनी गई जो ज़िंदगी,
वह अस्तित्व खो गया क्षितिज के चक्रव्यूह में.
अब अक्सर क्षितिज के दर्पण में
किसी का चेहरा ढूँढते-ढूँढते रात हो जाती है.
और टिमटिमाते सितारों के साथ फिर वही खोज शुरू हो जाती है –
अपने सितारे की खोज!!!!

Image courtesy- Aneesh
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