Category: The Bard’s Apprentice!
William Wordsworth was spot on when he said “Poetry is the spontaneous overflow of powerful feelings: it takes its origin from emotion recollected in tranquility.” When my pen meets the paper, it always captures the many moods and their wild swings and emotions and their detours which overflows from my heart spontaneously into the paper transmogrifying into verses!!
कोरोना से लड़ो !
सीप अौर मोती
दुनिया के समंदर में
ग़म औ अश्क़ का हिसाब रख कर
परेशान होने से अच्छा है,
दर्द-ए-ग़म पर लेप चढ़ा दें अपने मुस्कराहटे-ए- मरहम का।
ग़म ख़ुशी में तो नहीं बदलेगी।
पर शायद हम भी ख़ूबसूरत, आबदार मोती बना दें
अपनी चुभन अौर दर्द को,
सीप की तरह…….
जब सीप / मॉलस्क वायु, जल व भोजन की आवश्यकता के लिए कभी-कभी अपने शेल के द्वार खोलते हैं। तब कुछ विजातीय पदार्थ जैसे रेत कण, कीड़े-मकोड़े आदि उस खुले मुंह में प्रवेश कर जाते हैं। उसके अंदर रहने वाला जीव या मॉलस्क उसके चुभन से बचने के लिये उस पर कठोर पदार्थ /क्रिटलीय रूप में कैल्सियम कार्बोनेट डिपॉजिट करने लगता हैं. सीप अपनी त्वचा से निकलने वाले चिकने तरल पदार्थ द्वारा उस विजातीय पदार्थ पर परतें चढ़ाने लगता है। जो मोती या ‘मुक्ता’ बन जाती है।
A pearl is a hard, glistening object produced within the soft tissue (specifically the mantle) of a living shelled mollusk or another animal, such as fossil conulariids. Just like the shell of a mollusk, a pearl is composed of calcium carbonate (mainly aragonite or a mixture of aragonite and calcite)[3] in minute crystalline form, which has been deposited in concentric layers. The ideal pearl is perfectly round and smooth, but many other shapes, known as baroque pearls, can occur.
यादों के चंदन
चंदन के साथ रखे थे कुछ
यादें अौ
ख़्वाब !
कुछ ख़्वाब
पूरे हुए,
कुछ अधूरे हैं।
पर संदल की ख़ुशबू से भर गये हैं।
चिड़ियों की मीटिंग
अहले सुबह नींद खुली मीठी, गूँजती आवाज़ों से.
देखा बाहर परिंदों की सभा है.
शोर मचाते-बतियाते किसी गम्भीर मुद्दे पर, सभी चिंतित थे
– इन इंसानों को हुआ क्या है?
बड़े शांत हैं? नज़र भी नहीं आते?
कहीं यह तूफ़ान के पहले की शांति तो नहीं?
हाल में पिंजरे से आज़ाद हुए हरियल मिट्ठु तोते ने कहा –
ये सब अपने बनाए कंकरीट के पिंजरों में क़ैद है.
शायद हमारी बद्दुआओं का असर है.
जागता रहा चाँद
जागता रहा चाँद सारी रात साथ हमारे.
पूछा हमने – सोने क्यों नहीं जाते?
कहा उसने- जल्दी हीं ढल जाऊँगा.
अभी तो साथ निभाने दो.
फिर सवाल किया चाँद ने –
क्या तपते, रौशन सूरज के साथ ऐसे नज़रें मिला सकोगी?
अपने दर्द-ए-दिल औ राज बाँट सकोगी?
आधा चाँद ने अपनी आधी औ तिरछी मुस्कान के साथ
शीतल चाँदनी छिटका कर कहा -फ़िक्र ना करो,
रात के हमराही हैं हमदोनों.
कितनों के….कितनी हीं जागती रातों का राज़दार हूँ मैं.
दूसरी दीवाली
पहली बार देखा और सुना साल में दो बार दीवाली!
दुःख, दर्द में बजती ताली.
साफ़ होती गंगा, यमुना, सरस्वती और नादियाँ,
स्वच्छ आकाश, शुद्ध वायु,
दूर दिखतीं बर्फ़ से अच्छादित पर्वत चोटियाँ.
यह क़हर है निर्जीव मक्खन से कोरोना का,
या सबक़ है नाराज़ प्रकृति का?
देखें, यह सबक़ कितने दिन टिकता है नादान, स्वार्थी मानवों के बीच.

सूरज
थका हरा सूरज रोज़ ढल जाता है.
अगले दिन हौसले से फिर रौशन सवेरा ले कर आता है.
कभी बादलो में घिर जाता है.
फिर वही उजाला ले कर वापस आता है.
ज़िंदगी भी ऐसी हीं है.
बस वही सबक़ सीख लेना है.
पीड़ा में डूब, ढल कर, दर्द के बादल से निकल कर जीना है.
यही जीवन का मूल मंत्र है.

चीन और चमगादड़ Wet market of China
लोग हो ना हों, हौसले इनके ज़िन्दा हैं.
इतनी जल्दी भूल गए,
वेट बाज़ार- कोरोना कितना बड़ा फंदा है?
अपनी नहीं चिंता अगर,
दुनिया की तो सोचों.
इन चमगादड़, पैंगोलीन, कुत्तों की सोचों…….


चमगादड़ और चीन- आओ थोड़ा हँस लें !
शाम के धुँधलके में एक बड़ा चमगादड़,
अपने विशाल पंख फैलाए,
इतराता, उड़ता हुआ ऐसे गुज़रा,
जैसे रातों का राजा हो …..
कहा हमने – बच्चू यहाँ हो इसलिए इतरा रहे हो,
चीन में होते तो सूप के प्याले में मिलते …….
पास के पेड़ पर उलटा लटक कर वह हँसा और बोला-
हम भी कुछ कम तो नहीं.
एक झटके में सारी दुनिया उलट-पलट दी.
अब चमगादड़ का सूप पीनेवालों को
अपनी छोटी-छोटी पैनी आँखों से चिकेन भी चमगादड़ दिखेगा.



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