जिंदगी में हर रिश्ते एक दूसरे से
मुकाबला,आज़माइशें या
बराबरी करने के लिये नहीं होते हैं।
कुछ रिश्ते एक- दूसरे के हौसले इज़ाफ़ा करने अौर
कमियों को पूरा करने के लिये भी होते हैं।।
तभी ये रिश्तों को दरख्तों के जड़ों की तरह थामे रखते हैं।
William Wordsworth was spot on when he said “Poetry is the spontaneous overflow of powerful feelings: it takes its origin from emotion recollected in tranquility.” When my pen meets the paper, it always captures the many moods and their wild swings and emotions and their detours which overflows from my heart spontaneously into the paper transmogrifying into verses!!
जिंदगी में हर रिश्ते एक दूसरे से
मुकाबला,आज़माइशें या
बराबरी करने के लिये नहीं होते हैं।
कुछ रिश्ते एक- दूसरे के हौसले इज़ाफ़ा करने अौर
कमियों को पूरा करने के लिये भी होते हैं।।
तभी ये रिश्तों को दरख्तों के जड़ों की तरह थामे रखते हैं।
तारीख़ों में छुपी हैं कितनी कहानियाँ.
किसी तारीख़ से जुड़ी होतीं हैं यादें,
किसी से दर्द, किसी से ख़ुशियाँ.
किसी से उम्मीद, आशाएँ और अरमान.
और कुछ तारीख़ें कब आ कर चली जातीं हैं,
पता हीं नहीं चलता.
जीवन की परीक्षाओं को हँस कर,
चेहरे की मुस्कुराहट के साथ झेलना तो अपनी-अपनी आदत होती है.
जीवन ख़ुशनुमा हो तभी मुस्कुराहट हो,
यह ज़रूरी नहीं.
जीवन प्रवाह में बहते-बहते आ गये यहाँ तक।
माना, बहते जाना जरुरी है।
परिवर्तन जीवन का नियम है।
पर जब धार के विपरीत,
कुछ गमगीन, तीखा मोङ आ जाये,
किनारों अौर चट्टानोँ से टकाराने लगें,
जलप्रवाह, बहते आँसुअों से मटमैला हो चले,
तब?
तब भी,
जीवन प्रवाह का अनुसरण करो।
यही है जिंदगी।
प्रवाह के साथ बहते चलो।
अनुगच्छतु प्रवाह ।।
संगेमरमर से पूछो तराशे जाने का दर्द कैसा होता है.
सुंदर द्वार, चौखटों और झरोखों में बदल गई,
साधारण लकड़ी से पूछो काटे जाने और नक़्क़ाशी का दर्द.
सुंदर-खरे गहनों से पूछो तपन क्या है?
चंदन से पूछो पत्थर पर रगड़े-घिसे जाने की कसक,
कुन्दन से पूछो आग की तपिश और जलन कैसी होती है.
हिना से पूछो पिसे जाने का दर्द.
कठोर पत्थरों से बनी, सांचे में ढली मंदिर की मूर्तियां से पूछो चोट क्या है.
तब समझ आएगा,
तप कर, चोट खा कर हीं निखरे हैं ये सब!
हर चोट जीना सिखाती है हमें.
अौर बार-बार ज़िंदगी परखती है हमें।
दुनिया के समंदर में
ग़म औ अश्क़ का हिसाब रख कर
परेशान होने से अच्छा है,
दर्द-ए-ग़म पर लेप चढ़ा दें अपने मुस्कराहटे-ए- मरहम का।
ग़म ख़ुशी में तो नहीं बदलेगी।
पर शायद हम भी ख़ूबसूरत, आबदार मोती बना दें
अपनी चुभन अौर दर्द को,
सीप की तरह…….
जब सीप / मॉलस्क वायु, जल व भोजन की आवश्यकता के लिए कभी-कभी अपने शेल के द्वार खोलते हैं। तब कुछ विजातीय पदार्थ जैसे रेत कण, कीड़े-मकोड़े आदि उस खुले मुंह में प्रवेश कर जाते हैं। उसके अंदर रहने वाला जीव या मॉलस्क उसके चुभन से बचने के लिये उस पर कठोर पदार्थ /क्रिटलीय रूप में कैल्सियम कार्बोनेट डिपॉजिट करने लगता हैं. सीप अपनी त्वचा से निकलने वाले चिकने तरल पदार्थ द्वारा उस विजातीय पदार्थ पर परतें चढ़ाने लगता है। जो मोती या ‘मुक्ता’ बन जाती है।
A pearl is a hard, glistening object produced within the soft tissue (specifically the mantle) of a living shelled mollusk or another animal, such as fossil conulariids. Just like the shell of a mollusk, a pearl is composed of calcium carbonate (mainly aragonite or a mixture of aragonite and calcite)[3] in minute crystalline form, which has been deposited in concentric layers. The ideal pearl is perfectly round and smooth, but many other shapes, known as baroque pearls, can occur.
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