अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस International Workers’ Day 1 May

अभी मीलों है जाना,

बस चलते जाना है.

भूखे–प्यासे चलते जाना है.

पहुँच गए गाँव तब भी सवाल वही है–

बिन रोज़गार अब खाएंगे कैसे?

हमारी तो शायद गिनती हीं नहीं हैं.

अगर मर गए कोरोना से तब हम गिनती में तो होंगे.

 

 

International Workers’ Day, also known as Workers’ Day or Labour Day in some countries and often referred to as May Day.

हर साल 1 मई को दुनिया भर में “ अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस“, श्रम दिवस या मई दिवस (International Labour Day) मनाया जाता है। इसे पहली बार 1 मई 1886 को मनाया गया था। भारत में इसे सबसे पहले 1 मई 1923 को मनाया गया था।

सूरज ङूबने के बाद

सूरज ङूबने के बाद

क्षितिज़ के ईशान कोण पर

दमकता है एक सितारा…..

शाम का सितारा !

रौशन क़ुतबी सितारा

 ध्रुव तारा…

सूरज डूब जाए तब भी,

अटल और दिव्यमान रहने का देता हुआ संदेश.

शिकवे

शिकवे-शिकायतों के लिए यह ज़िंदगी छोटी है,

पर क्या करें, जो कोई रुका नहीं सुनने के लिये…….

वैसे, ज़िंदगी में लुत्फ़ इन शिकायतों का भी है –

चंद क़तरे अश्क़,

अधूरी आरज़ू -हसरतें…..

और ना- उम्मीद शिकायतें….

गिले तो होंगे हीं.

काँच की नगरी

टूट कर मुहब्बत करो

या मुहब्बत करके टूटो.

यादों और ख़्वाबों के बीच तकरार चलता रहेगा.

रात और दिन का क़रार बिखरता रहेगा.

कभी आँसू कभी मुस्कुराहट का बाज़ार सजता रहेगा.

यह शीशे… काँच की नगरी है.

टूटना – बिखरना, चुभना तो लगा हीं रहेगा.

जिंदगी के रंग – 203

जिंदगी में हर रिश्ते एक दूसरे से

मुकाबला,आज़माइशें या

बराबरी करने के लिये नहीं होते हैं।

कुछ रिश्ते एक- दूसरे के हौसले इज़ाफ़ा करने अौर

कमियों को पूरा करने के लिये भी होते हैं।।

तभी ये रिश्तों को दरख्तों के जड़ों की तरह थामे रखते हैं।

तारीख़ों में छुपी कहानियाँ

तारीख़ों में छुपी हैं कितनी कहानियाँ.

किसी तारीख़ से जुड़ी होतीं हैं यादें,

किसी से दर्द, किसी से ख़ुशियाँ.

किसी से उम्मीद, आशाएँ और अरमान.

 और कुछ तारीख़ें कब आ कर चली जातीं हैं,

पता हीं नहीं चलता.

रश्क

 

जीवन के रंग – 202

जीवन की परीक्षाओं को हँस कर,

चेहरे की मुस्कुराहट के साथ झेलना तो अपनी-अपनी आदत होती है.

जीवन ख़ुशनुमा हो तभी मुस्कुराहट हो,

यह ज़रूरी नहीं.

 

अनुगच्छतु प्रवाह !

जीवन प्रवाह में बहते-बहते आ गये यहाँ तक।

 माना,  बहते जाना जरुरी है। 

परिवर्तन जीवन का नियम है।

पर जब धार के विपरीत,

 कुछ गमगीन,  तीखा मोङ आ जाये,

  किनारों अौर चट्टानोँ से टकाराने  लगें, 

  जलप्रवाह, बहते आँसुअों से मटमैला हो चले,

   तब?

 तब भी,

जीवन प्रवाह का अनुसरण करो।

यही है जिंदगी।

प्रवाह के साथ बहते चलो।

 अनुगच्छतु प्रवाह ।।  

जिंदगी के रंग – 201

संगेमरमर से पूछो तराशे जाने का दर्द कैसा होता है.

सुंदर द्वार, चौखटों और झरोखों में बदल गई,

साधारण लकड़ी से पूछो काटे जाने और नक़्क़ाशी का दर्द.

सुंदर-खरे गहनों से पूछो तपन क्या है?

चंदन से पूछो पत्थर पर रगड़े-घिसे जाने की कसक,

कुन्दन से पूछो आग की तपिश और जलन कैसी होती है.

हिना से पूछो पिसे जाने का दर्द.

कठोर  पत्थरों से बनी, सांचे में ढली मंदिर की मूर्तियां से पूछो चोट क्या है.

तब समझ आएगा,

तप कर, चोट खा कर हीं निखरे हैं ये सब!

हर चोट जीना सिखाती है हमें.

अौर बार-बार ज़िंदगी परखती है हमें।