
कहते हैं,
बुरा हो या भला हो,
हर वक्त गुजर जाता है।
पर कुछ वक्त कभी मरते नहीं,
कभी गुजरते नहीं।
जागते-सोते ख़्वाबों ख़्यालों में
कहीं ना कहीं,
शामिल रहते हैं।
ज़िंदगी का हिस्सा बन कर।
William Wordsworth was spot on when he said “Poetry is the spontaneous overflow of powerful feelings: it takes its origin from emotion recollected in tranquility.” When my pen meets the paper, it always captures the many moods and their wild swings and emotions and their detours which overflows from my heart spontaneously into the paper transmogrifying into verses!!

कहते हैं,
बुरा हो या भला हो,
हर वक्त गुजर जाता है।
पर कुछ वक्त कभी मरते नहीं,
कभी गुजरते नहीं।
जागते-सोते ख़्वाबों ख़्यालों में
कहीं ना कहीं,
शामिल रहते हैं।
ज़िंदगी का हिस्सा बन कर।

ऐसा भी क्या जीना?
पूरी ज़िंदगी साथ गुज़र गई।
पर ना अपने आप से बात हुई,
ना तन की रूह से मुलाक़ात हुई।

दीया
हर दीया की होती है,
अपनी कहानी।
कभी जलता है दीवाली में,
कभी दहलीज़ पर है जलता,
गुजरे हुए की याद का दीया
या चराग़ हो महफ़िल का
या हो मंदिर का।
हवा का हर झोंका डराता है, काँपते लहराते एक रात जलना और ख़त्म हो जाना,
है इनकी ज़िंदगी।
फिर भी रोशन कर जाते है जहाँ।

चढ़ते सूरज के कई हैं उपासक,
पर वह है डूबता अकेला।
जलते शोले सा तपता आफ़ताब हर रोज़ डूबता है
फिर लौट आने को।
इक रोज़ आफ़ताब से पूछा –
रोज़ डूबते हो ,
फिर अगले रोज़
क्यों निकल आते हो?
कहा आफ़ताब ने –
इस इंतज़ार में,
कभी तो कोई डूबने से
बचाने आएगा।

ज़िंदगी वह आईना है,
जिसमें अक्स
पल पल बदलता है।
इसलिए वही करो
जो देख सको।
“The only way you can conquer me is through Love and there I am gladly conquered” says Krishna in The Bhagavad Gita. The only way to win people is by spreading love and getting rid of hatred, anger, and vengeance.
Bhagavad Gita


यक़ीन और भरोसा टूटने पर,
अपने ऐतबार पर शर्मिंदा ना हों।
कहते हैं,
बार-बार कोई विश्वास तोड़े,
तब उसे जाने दो।
समझ लो,
यह है ईश्वर का संकेत।
क्योंकि
किसी से खिलवाड़ करने वाले से, नियति है खिलवाड़ करती।
यह है ऊपर वाले का नियम।

ज़िंदगी के रंग – 225
ज़माने की राहें रौशन करते वक्त,
ग़र कोई आपकी सादगी भरी बातों के
मायने निकले।
समझ लीजिए
सामने वाले ने मन बना रखा है
आपकी बातों को नकारने का।
ना ज़ाया कीजिए वक्त अपना।
बेहिचक, बेझिझक बढ़ जायें
अपनी राहों पर।
लोगों को अक्सर देखा है,
चिराग़ों को बुझा,
हवा के झोंकों पर तोहमत लगाते।

अभी तक लगता था
मर रहीं हैं नदियाँ,
गल रहें हैं ग्लेशियर,
धुँधले हो रहे हैं अंतरिक्ष,
कूड़ेदान बन रहे है सागर,
धरा और पर्वत…..
इंसानों की मलिनता से।
अब समझ आया
कई देश भी मर रहे हैं।
फ़र्क़ पड़ता है,
और दर्द होता है,
सिर्फ़ भुक्तभोगियों को।
बाक़ी सब जटिल जीवन के
जद्दोजहद में उलझे है।
विश्व राजनीति की पहेली है अबूझ।
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