ज़िंदगी के शतरंज

ज़िंदगी के शतरंज पर

सम्बंधों की गोटियाँ ना खेलो।

ग़र किसी की ज़्यादती

बिना जवाब दिए झेल गए,

तब जवाब ऊपरवाला देता है।

महाभारत रचने में महारत रखने वालों

का भी यही हश्र हुआ था।

हम सबसे ज़्यादा अपने हैं !

करो इश्क़ हर साँसों से,

साँसे ज़िंदगी…ताक़त है हमारी।

किसी और के फ़िक्र में ना टूटने दो दिल,

दिल अपना है।

चोट ना लगने दो अपने अंतरात्मा को।

रूह तुम्हारी है,

किसी भीड़ में ना गुम होने दो अपने आप को,

जब टूटने लगो ज़िंदगी में, ठहर कर,

एक गहरी साँस लो और आइने

में निहारो अपने आप को।

याद रखो, हम सबसे ज़्यादा अपने हैं।

कर्म

जब हौसला अफजाई कम

और व्यंग बाण ज़्यादा हो जायें,

मायने बुलंदियाँ क़रीब हैं।

लोगों की निगाहे उठने लगें,

पैर नीचे खिंचने वाले बढ़ जायें,

मायने आसमाँ क़रीब है।

जब दोस्तों से दुश्मन ज़्यादा हो जायें।

लोगों की निगाहों में चढ़ने लगो।

मायने फ़लक के सितारे क़रीब हैं।

बस सब्र रखो, क्योंकि हर किसी के,

कर्म का नतीजा ज़रूर सामने आता है।

ज्वार-भाटा

सागर के उतरते ज्वार से बाहर आ गया प्रांगण …शिवाला, सागर फिर समेट लेता है आग़ोश में, वापस लौट कर भाटे की लहरों में। जीवन की लहरों में ख़ुशियाँ और ग़म ऐसे हीं उभरते-डूबते….आते-जाते रहते हैं।

(गणपति और शिव, कर्टर रोड, मुंबई। ज्वार-भाटे के साथ हाई टाईड में यह स्वयंभू मंदिर सागर की लहरों में डूब जाता है। लो टाईड में साग़र की लहरों से बाहर आ जाता है।)

बूँद-बूँद

क़सूर और सज़ा

कहते हैं त्रुटि कपड़ों में हैं।

पर वे प्राचीन मूर्तियाँ जो मंदिरों में पाषाणों पर

युगों-युगों पहले उकेरी गई सौंदर्यपूर्ण मान।

उन्हें अश्लील या अर्ध नग्न तो नहीं कहते।

आज़ कहते हैं ग़लती लड़कियों की है।

क्या तब लोगों की निगाहें सात्विक थीं

या तब सौंदर्य बोध अलग था।

सुनते है, सब दोष मोबाइल का है।

बौद्ध भिक्षुकों के तप स्थली अजन्ता गुफाओँ में

उकेरे बौद्ध धर्म दृश्य और नारी सौंदर्य शिल्पकारी,

उत्कृष्ट कलात्मकता की है पराकाष्ठा।

हमारी प्राचीन संस्कृति कहती कुछ और है।

और आज कुछ और कहा जाता है।

भूल कहाँ है? गलती किसकी है?

चूक कहाँ हुई? क़सूर किसका?

सज़ा किसे?

गुनाहगार कोई, सज़ा पाए बेगुनाह?

आभार

कहते है आभार देते समय रहता मन शुद्ध सात्विक।

क्योंकि शुक्रगुज़ार होंने के वक्त

हम सब के साथ होती है सकारात्मक ऊर्जा।

आभार देते वक्त, शिकवे-गिले आते नहीं हैं ज़ेहन में।

अब विज्ञान के ख़यालात भी लगे हैं मिलने।

वे भी मानने लगें हैं, शुक्रिया कैसे भी अदा करो।

लफ़्ज़ों से, मन हीं मन या दिल से।

ख़ूबसूरती, सुकून और ख़ुशियाँ भरी होती है उनमें।

positive psychology research – gratitude is strongly and consistently associated with greater happiness. Gratitude helps people feel more positive. Giving thanks can make you happier – Harvard Health

आदतें National Break Free From bad habits Day !

आदतें दर्द भी देती हैं और मज़ा भी!
इनसे मिलती हैं आह भी और वाह भी।
कुछ आदतें ग़ुलाम बनाती हैं।
कुछ रचना की आज़ादी दिलातीं है।
जलते दीप को बुझाने, दर्द औ ग़म देने वालों
की आदत भी जाती नहीं।
बस, खिलखिलाने-मुस्कुराने
की आदत जाने ना दो।

Research shows that people with hobbies are less likely to suffer from stress, low mood, and depression. Activities that get you out and about can make you feel happier and more relaxed

National Break Free From the Big Three Day, celebrated on July 14, is an opportunity to break free from bad habits, relationships, and stale mobile plans.

National Break Free From the Big Three Day, celebrated on July 14, is an opportunity to break free from bad habits, relationships, and stale mobile plans.

ज़िंदगी के रंग

कई जंग अक्सर हम अपने आप से हैं लड़ते,

ख़्वाबों, ख़्वाहिशों और दुनियादारियों की।

कभी दिल से जंग पेचीदागियों भरा!

कभी दिमाग़ से मामला इश्क़ भरा।

कभी पूरे होते ख़्वाब, कभी क़त्ल होतीं ख्वाहिशें।

फिर भी सुर्ख़-रु दिल धड़कता रहता है।

सब लड़ते रहते है अपनी-अपनी जंग।

ये हैं ज़िंदगी के रंग।

मायूसियाँ

अक्सर लोग हमें और हम लोगों को

आँखों हीं आँखों में, बिना समझे,

पूरे भरोसे के साथ पढ़ते रहते है।

कभी ख़त,कभी सागर की तहरीरों,

कभी परियों, देव, दानवों, दोस्तों,

दुश्मनों की कहानियों की तरह।

पर भूल जातें हैं कि जो ग़लत पढ़ लिया

सामने वाले को तो

सज़ा औ मायूसियाँ ख़ुद को मिलेंगी।

अनजाने हीं खो देंगे किसी हमदम को।