
रहमतों की बारिश होगी


चटख़ कर बिना शोर टूटते हैं दिल।
यक़ीन और विश्वास बेआवाज़ टूटते है।
तय है, खामोशी में भी है शोर।
ग़र सुन सके, तो हैं अलफ़ाज़ बेमानी।
कहने वाले कहते हैं –
खामोशी होती है बेआवाज़ …. शांत।
खामोशी की है अपनी धुन
सुन सके तो सुन।

कुछ आवाज़ें दिल-औ-दिमाग़ को
हैं देतीं शांति और सुकून,
जैसे दूर मंदिरों में टुनटुनाती घंटियाँ
या कहीं बज रहा हो शांत, धीर-गंभीर शंख।
लहजा मानो, हलकी से आ रही हो
ख़ुश्बू या आरती की आवाज़ें।
जैसे ये कहतीं हैं गले लगा लो,
मीठी बोली की बहती कलकल-छलछल
चंचल बहते पानी को।
अमन और शांति की बहा दो निर्झर।
The International Day of Peace (or World Peace Day) celebrated annually on September 21 is devoted to strengthening the ideals of peace, both within and among all nations and peoples.

दर्द हो या ख़ुशियाँ,
सुनाने-बताने के कई होते हैं तरीक़े।
लफ़्ज़ों….शब्दों में बयाँ करते हैं,
जब मिल जाए सुनने वाले।
कभी काग़ज़ों पर बयाँ करते है,
जब ना मिले सुनने वाले।
संगीत में ढाल देते हैं,
जब मिल जाए सुरों को महसूस करने वाले।
वरना दर्द महसूस कर और चेहरे पढ़
समझने वाले रहे कहाँ ज़माने में?

मालूम है कि ज़िंदगी है एक रंगमंच
और हम सब किरदार।
पर कौन है शेष रह गए कई अनुत्तरित
सवालों के जवाब का ज़िम्मेदार ?
सब जाएँगें ख़ाली कर बस्ती एक दिन।
पर ऐसे बिन बताए जाता है कौन?
बरहम….. आक्रोश, नाराज़गी जाती नहीं।
ज़वाब मिले, इतना तो मेरा हक़ बनता था।

बोतल से प्यार कर
महफ़ूज़ रहती है सूरा।
शराबी से आशिक़ी कर,
लगे नशेमन का कलंक।
हिना डाल पर हरी,
पाषाण की दोस्ती से बदल जाए रंग।
कमल का प्यार पानी संग
खिल जाए उसका रूप रंग।
लोहा का प्यार पानी से।
टूटे खा कर जंग।
कुछ लगाव अज़ीम रिश्ते हैं बनाते।
कुछ दोस्ती लगाते है कलंक।

ग़र किसी ने दिल और आत्मसम्मान है तोड़ा।
तब अपने आप से ना भागो ।
लोगों के सामने कुछ ना साबित करो।
खुद को समझो, खुद को प्यार करो।
अपने आख़री और सबसे करीबी आस हम हैं।
बस याद रखना है – विषैले रिश्तों से दूरी है ज़रूरी।
Human Psychology-
A trauma bond is a toxic connection
between an abuser and the abused
person. To overcome it Love and
Prioritising yourself , Give yourself time
to heal and Reconnect with yourself.

इससे तो अच्छा पाषाण युग रहा होगा।
जब जंग भूख व जीवन के लिए होता होगा।
जब अस्मत के जिम्मेदार वस्त्र नहीं होते होंगे।
ग्लैमर का नापतौल कपड़ों से नहीं होता होगा।
कपड़ों पर छींटाकशी की सियासत नहीं होती होगी।
काश जंग देश के किसी गम्भीर मुद्दे पर होता।
“सादा जीवन उच्च विचार” के ज्ञान पर होता।
विचार होता, लोग ज़िंदगी की जंग हार क्यों जातें हैं?
News – BJP still hanging in T-shirts and
khaki shorts: Bhupesh Baghel retorts
on ‘Rs 41k t-shirt’ jibe on Rahul Gandhi
World Suicide Prevention Day observed on 10th September.

ना कीजिए शक अपने वजूद पर।
और यक़ीन ना करें लोगों के
काँच से चुभते अल्फ़ाज़ों पर।
यह जानने के लिए सब्र कीजिए,
कि आप किसी की नज़रों में क्या हैं?
पत्थर, काँच, नगीना या हीरा ?
अनाड़ी हीरे को भी काँच समझ फेंक देता है।
पसंद करनेवाला तराशे काँच भी शौक़ से पहनते है।
वे आपमें क्या देखतें हैं,
यह रखता नहीं मायने ।
क्योकि अक्सर लोग दूसरों में
अपने विचारों का प्रतिबिम्ब देखते है।

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