It’s your road,
and yours alone.
others may walk it with you,
but no one can walk it for you.
~ Rumi
When I Asked God for Strength
He Gave Me Difficult Situations to Face
When I asked God for intelligence
He Gave Me Puzzles to Solve.
When I Asked God for Happiness
He Showed Me Some Unhappy People
When I Asked God for Wealth
He Showed Me How to Work Hard
When I Asked God for Favors
He Showed Me Opportunities to Work Hard
When I Asked God for Peace
He Showed Me How to Help Others
God Gave Me Nothing I Wanted
He Gave Me Everything I Needed.
Swami Vivekanand
मेरे जीवन में कुछ रहस्यमय घटनाएँ हुई हैं। जिन्हे याद कर मै रोमांचित हो जाती हूँ। यह वास्तविक घटना सन 1991 की है। तब हम घाटशिला नाम के छोटे से शहर में रहते थे । एक बार हम सभी कार से राँची से घाटशिला लौट रहे थे। यह दूरी लगभग 170 किलोमीटर थी। यह दूरी समान्यतः चार घंटे में हम अक्सर तय करते थे।
शाम का समय था। सूरज लाल गोले जैसा पश्चिम में डूबने की तैयारी में था। मौसम बड़ा सुहाना था। यात्रा बड़ी अच्छी चल रही थी। मेरे पति कार चला रहे थे। साथ ही गाना गुनगुना रहे थे। मेरी आठ वर्ष की बड़ी बेटी व एक वर्ष की छोटी बेटी कार के पीछे की सीट पर आपस में खेलने में मसगुल थीं।
तभी एक तेज़ आवाज़ ने हम सभी को भयभीत कर दिया। कार तेज़ी से आगे बाईं ओर झुकती हुई सड़क पर घिसटने लगी। मेरे पति ने किसी तरह कार को रोका। कार से बाहर आकर हमने देखा कि आगे का बायाँ चक्का अपनी जगह से पूरी तरह बाहर निकाल आया है। कार एक्सल के सहारे घिसती हुई रुक गई थी। कार का चक्का पीछे सड़क के किनारे पड़ा था। हम हैरान थे कि ऐसा कैसे हुआ? हाईवे पर हम एक भयंकर दुर्घटना से हम बाल-बाल बच गए थे।
एक बड़ा हादसा तो टल गया था। पर हम चिंतित थे। शाम ढाल रही थी। शहर से दूर इस सुनसान जगह पर कार कैसे बनेगी? सड़क के दूसरी ओर मिट्टी की छोटी सी झोपड़ी नज़र आई। जिसमें चाय की दुकान थी। मेरे पति उधर बढ़ गए। मैं कार के पास खड़ी थी। तभी मेरी नज़र कार के पीछे कुछ दूर पर गिरे एक नट पर पड़ी। मैंने उसे उठा लिया। किसी अनजान प्रेरणा से प्रेरित मैं काफी आगे तक बढ़ती गई। मुझे और भी नट व बोल्ट मिलते गए और मैं उन्हे उठा कर अपने साड़ी के पल्लू में जमा करते गई। जबकि मैं यह भी नहीं जानती थी कि वे किसी काम के हैं या नहीं।
मैं जब वापस लौटी तब मेरे पति मेरे लिए परेशान दिखे। तब तक हमारी कार के पास कुछ ग्रामीण इकट्ठे हो गए थे। उनमें से एक चपल सा दिखने वाल साँवला, कद्दावर व्यक्ति मदद करने आगे आया। उसके चपटे, बड़े से चेहरे पर चोट के निशान थे और छोटी-छोटी आँखों में जुगनू जैसी चमक थी। मेरे पास के नट व बोल्ट देख कर वह उत्साहित हो गया। उसने कहा- “दीदी जी, आपने तो सारे नट-बोल्ट जमा कर लिए हैं। लाईये मैं आपकी कार बना देता हूँ। मुझे यह काम आता है।” तुरंत उसने कुछ ग्रामीणों को पास के गाँव से कुछ औज़ार लाने भेजा। उसके “दीदी” संबोधन और ग्रामीणो पर प्रभाव देख कर हमें तस्सली हुई। चलो, अब कार बन जाएगी।
मेरे पति ने मुझे और बच्चों को चाय की दुकान पर बैठा कर चाय दिलवाई और स्वयं कार ठीक करवाने लगे। चाय वाला मुझसे बार-बार कुछ कहने की कोशिश कर रहा था। चाय वाले ने फुसफुसाते हुए मुझ से कहा- ” आप यहाँ मत रुकिए। अब रात भी हो रही है। आप के साथ बच्चे भी हैं। तुरंत यहाँ से चले जाइए। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वह ऐसी बातें क्यों कर रहा है। चाय वाले ने फिर मुझसे कहा- ” वह व्यक्ति बड़ा खतरनाक है जो आपलोगों की सहायता कर रहा है। यहाँ पर होनेवाले ज़्यादातर अपराधों में यह शामिल होता है। हाल में हुए हत्या का आरोपी है। आप यहाँ मत रुकिए। थोड़ी देर में मेरी दुकान भी बंद हो जाएगी। यह तो बड़ा दुष्ट व्यक्ति है। पता नहीं, कैसे आपकी मदद कर रहा है। यहाँ सभी उससे बड़ा डरते है।” वह लगातार एक ही बात तोते की तरह रट रहा था -“आप बच्चों को ले कर जाइए। मत रुकिए।” चाय दुकान में बैठे अन्य लोगों ने भी सहमति में सिर हिलाया अौर बताया कि वह व्यक्ति वहाँ का कुख्यात अपराधी है।
मै घबरा गई। मुझे याद आया कि मेरे काफी गहने भी साथ है क्योंकि, मैं एक विवाह में शामिल होने राँची गई थी। मैंने अपने पति को सारी बात बताने की कोशिश की। पर वह अनजान व्यक्ति लगातार अपने पति के साथ बना रहा। वह मुझे अकेले में बात करने का अवसर नहीं दे रहा था। मुझे परेशान देख , उस अजनबी ने मुझे समझाते हुए कहा- “दीदी, आप घबराइए मत। हम हैं ना। भय की बात नहीं है। हमारे रहते यहाँ आपको कोई परेशान नहीं कर सकता। वह हमें रोकने का जितना प्रयास कर रहा था। मन में उतना ही डर बढ़ता जा रहा था। उसकी मीठी-मीठी बातों के पीछे षड्यंत्र नज़र आ रहा था।
मैंने किसी तरह अवसर निकाल कर अपने पति को सब बातें बताईं। पर वहाँ से जाने का कोई साधन नहीं था। अब क्या करूँ। कुछ समझ नहीं आ रहा था। अँधेरा घिरना शुरू हो चुका था। तभी राँची जाने वाली एक बस आती नज़र आई। ग्रामीणों ने बताया कि बस यहाँ नहीं रुकती है। घबराहटवश, मैं बीच सड़क पर खड़ी हो गई। बस को रोकने के लिए हाथ हिलाने लगी। बस रुक गई। बस वाले ने मेरी परेशानी और बच्चों को देख कर हमें बैठा लिया। वह अजनबी लगभग गिड्गिड़ाने लगा। “दीदी जी, मैं जल्दी ही कार बना दूँगा। आप मत जाइए।” वह मेरे पति का हाथ पकड़ कर अनुरोध करने लगा।
कुछ सोचते हुए मेरे पति ने मुझे दोनों बेटियों के साथ बस में बैठा दिया और मेरे जेवरों का सूटकेस भी साथ दे दिया। वे स्वयं वहाँ रुक गए। मेरा दिल आशंकाओं से भर गया। पर उन्हों ने आश्वासन देते हुए मुझे भेज दिया।राँची पहुँच कर अपने घर में मैंने सारी बातें बताई। उन्होंने तत्काल कारखाने (कार सर्विसिंग ) में फोन किया। दरअसल उस दिन सुबह ही हमारी कार वहाँ से धुल कर आई थी। पता चला कार सर्विसिंग वालों के भूल से यह दुर्घटना हुई थी। कार के चक्कों के नट-बोल्ट उन्होंने लगाया गया था। पर औज़ार से कसा नहीं था। कार सर्विसिंग के मालिक ने अपनी गलती मानी। तुरंत ही कार सर्विसिंग वालों ने एक कार और कुछ मेकैनिकों को हमारे यहाँ भेजा। जिससे वे मेरे पति और मेरी खराब कार को सुधार कर वापस ला सकें।
कार सर्विसिंग कें लोग मुझ से कार खराब होने की जगह समझ ही रहे थे। तभी मैंने देखा मेरे पति अपनी कार ले कर आ पहुंचे हैं। मै हैरान थी। उन्हों ने बताया कि बड़ी मेहनत से उस व्यक्ति ने कार ठीक किया। कार के रिम को सड़क से ऊपर उठाने और चक्के को सही जगह पर लगाने में उसे बड़ी कठिनाई हुई थी। पर वह लगातार मेरे अकेले लौटने का अफसोस कर रहा था।मैं इस घटना और उस अजनबी को आज भी भूल नहीं पाती हूँ। कौन था वह अजनबी? वह मुझे दीदी-दीदी बुलाता रहा। पर घबराहट और जल्दीबाजी में मैंने अपने अनाम भाई का नाम तक नहीं पूछा । पता नहीं उससे क्या रिश्ता था ? जो उसने बिना माँगे मदद के लिये हाथ बढाया। क्या ऐसे अजनबी को भुलाया जा सकता है? मैं आज भी इस घटना को याद कर सोंच में पड़ जाती हूँ । क्यों कभी एक अपराधी भी मददगार बन जाता है? उस दिन मैंने मान लिया कि बुरे से बुरे इंसान में एक अच्छा दिल होता है।
ऐसे में मेरी नज़रें ऊपर उठ जाती है और हाथ नमन की मुद्रा में जुड़ जाते हैं। जरूर कोई अदृश्य शक्ति हमारी रक्षा करती है। हम उसे चाहे जिस नाम से याद करें- ईश्वर, अल्लाह, क्राइस्ट ………..
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Whatever happens to you,
don’t fall in despair.
Even if all the doors are closed,
a secret path will be there for you that no one knows.
You can’t see it yet but so many paradises are at the end of this path.
Be grateful! It is easy to thank after obtaining what you want, thank before having what you want.
~ Shams Tabrizi
It takes years to build up trust, only seconds to destroy it. But betrayal has its positive side too.
Image from internet.
28 दिसंबर 2014 की सुबह थी। बीते हुए क्रिसमस की खुमारी थी। यहाँ-वहाँ सजावटी सितारे और क्रिसमस-ट्री नज़र आ रहे थे। आनेवाले नव वर्ष का उत्साह माहौल में छाया था। खुशनुमा गुलाबी जाड़ा पुणे के मौसम को खुशगवार बना रहा था। मैं, मेरे पति और पुत्री पुणे से मुंबई जाने के लिए टैक्सी से निकले थे। हल्की ठंड की वजह से हमें चाय पीने की इच्छा हुई। टैक्सी ड्राईवर ने पुणे के महात्मा गाँधी रोड के करीब एक ईरानी रेस्टरेंट के चाय-मस्के की बड़ी तारीफ की। हमारे कहने पर वह हमें वहाँ ले गया।
यह सैन्य क्षेत्र था।यहाँ चारो ओर बड़े-बड़े हरे-भरे पेड़ थे। सड़क के किनारे करिने से पौधे लगे थे। यहाँ की हरियाली भरी खूबसूरती और शांत वातावरण बड़ी अच्छा लगा। पर टैक्सी रुकते ही पास में एक भिखारिन नज़र आई। गंदे ऊँचे स्कर्ट और लटकी हुई शर्ट के ऊपर फटी पुरानी स्वेटर और बिखरे बाल में बड़ी अजीब लग रही थी। बेहद दुबली पतली थी। शायद पागल भी थी। सड़क के किनारे, रेस्टोरेन्ट के बगल में खड़ी थी। उसने नज़र उठा कर हमारी ओर देखा। मैं उससे बचते हुए तेज़ी से दूसरी तरफ से घूमते हुए रेस्टोरेन्ट की तरफ बढ़ी। वह भी शायद जल्दी में थी। अपनी धुन में वह दूसरी ओर बढ़ गई। मैं ने चैन की साँस ली। सड़कों पर ऐसे भीख माँगनेवाले लोग मुझे असहज बना देते हैं। पता नहीं यह भिक्षावृति कब हमारे देश से ख़त्म होगी। किसी भी खूबसूरत जगह पर ये एक बदनुमा धब्बे की तरह लगते हैं। मेरी समझ में नहीं आता है कि इन्हे भीख दे कर इस प्रवृति को बढ़ावा देना चाहिए या डांट कर हटा देना चाहिए?
रेस्टोरेन्ट के अंदर जा कर मैं उस भिखारिन को भूल गई। ईरानी रेस्टोरेन्ट की चाय सचमुच बडी अच्छी थी। मन खुश हो गया। पूरा रेस्टोरेन्ट चाय पीने वाले लोगों से भरा था। गर्मा-गर्म चाय और साथ मेँ मस्का बड़ा लाजवाब था। पर बाहर निकलते ही फिर वही औरत नज़र आई। मैं तेज़ी से कार की ओर बढ़ी। शायद मैं उसे अनदेखा करना चाहती थी।
तभी उसने शुद्ध अँग्रेजी मेँ मुझे आवाज़ दी और कहा- “मैम, मैं बहुत भूखी हूँ। मुझे कुछ पैसे मिल जाते तो मस्का खरीद लेती। मेरे पास चाय है।“ उसने अपने हाथ मे पकड़ी हुई प्लास्टिक की गंदी और टेढ़ी-मेढ़ी बोतल दिखलाई। उसमें चाय थी। उसने फिर शालीनता से सलीकेदार भाषा में अपनी बात दोहराई। मैं अवाक उसे देख रही थी। यह पागल सी दिखनेवाली भिखारिन कौन है? इसकी बोली और व्यवहार तो कुछ और ही बता रही थी। वह पढ़ें- लिखी, किसी अच्छे परिवार की तरह व्यवहार कर रही थी।
मैंने पीछे से आ रहे अपने पति की ओर देखा अौर उस महिला को कुछ पैसे देने का इशारा किया। उन्होने पॉकेट से कुछ रुपये निकाल कर उस महिला को दे दिए। उस महिला ने मुस्कुरा कर मृदु स्वर में धन्यवाद दिया। फिर मेरी ओर देखा और मेरे खुले बालों की प्रशंसा करते हुए नव वर्ष की शुभ कामना दी और कहा –“हैप्पी न्यु ईयर !! टेक केयर ….अपना ख्याल रखना।”
कार मेँ बैठते हुए मैंने अपना आश्चर्य प्रकट किया-“ इतनी सलीकेदार महिला इस हालत में क्यों है?” तब टैक्सी ड्राईवर ने बताया कि वह महिला किसी जमाने के वहाँ के अति समृद्ध, डर्बी किंग की पत्नी है। अति-धनी, जुआरी और रेस के शौकीन पति की वजह से उसका यह हश्र हुआ। जुआ सिर्फ महाभारत काल का कलंक नहीं है। आज भी कई निर्दोष परिवारों को इसका मुल्य चुकाना पड़ा है।
उस दिन पहली बार भिक्षावृति का औचित्य समझ आया और लगा कि ऐसे लोगों को मदद करने पर मन मेँ किसी तरह की दुविधा नहीं होनी चाहिये। दरअसल भिक्षावृति प्राचीन काल से जरूरतमंदों, विद्यार्थियों और संतों के आजीविका का साधन रहा है। पर आज-कल यह एक गलत प्रचलन बन गया है। कुछ बेजरूरत लोगों ने इसे पेशा बना लिया है।
Source: वह कौन थी? ( अद्भुत अनुभव )
Image from internet
लिखती तो मैं पहले भी थी।
कभी कुछ छप जाता था,
तब खुश हो लेती थी।
कभी लिखे पन्ने रखे-रखे पीले पड़
समय की भीड़ में कहीं खो जाते थे।
धन्यवाद ब्लॉग की दुनिया,
मन की बातें लिखने के लिए…………
इतना बड़ा आसमान और इतनी बड़ी ज़मीन दे दी है ।
ढेरो जाने-अनजाने पाठक और आलोचक,
सबको धन्यवाद।
अब मन की हर बात, हर विचार को,
जब चाहो लिख डालो।
मन में भरे ख़ज़ाने और उमड़ते-घुमड़ते विचारों को
पन्ने पर उतारने की पूरी छूटहै।
लिखती तो मैं पहले भी थी, पर अब लिखने में मज़ा आने लगा है।
Source: लिखती तो मैं पहले भी थी (कविता )
Burnout is a state of emotional, mental, and physical exhaustion caused by excessive and prolonged stress. It occurs when you feel overwhelmed, emotionally drained, and unable to meet constant demands.
बर्न-आउट क्या है ?
ज़िंदगी की भागम-भाग, तनाव, काम की अधिकता अक्सर हमे शारीरिक और मानसिक रूप से थका देती है। जब यह थकान और परेशानी काफी ऊंचे स्तर तक चला जाता है तब ऐसा लगने लगता है जैसे जिंदगी की सामान्य समस्याओ को भी सुलझाना कठिन हो गया है। बर्न-आउट मानसिक या शारीरिक कारणो से हो सकता है। यह लंबे दवाब तथा थकान का परिणाम होता है।बर्न-आउट कार्य-संबंधी या व्यक्तिगत या दोनों कारणो से हो सकता है। ऐसे में मानसिक तनाव व स्ट्रैस बढ़ जाता है। स्वभाव में चिड़चिड़Iपन बढ़ जाता है। व्यक्ति अपने को ऊर्जा-विहीन, असहाय व दुविधाग्रस्त महसूस करने लगता है।
बर्न-आउट कैसे पहचाने ?
ऐसे मे नकारात्मक सोच ज्यादा बढ़ जाती है। आत्मविश्वास व प्रेरणा मे कमी , अकेलापन, आक्रोश, नशे की लत, जिम्मेदारियो से भागने जैसे व्यवहार बढ़ जाते है। ऐसा व्यक्ति अपना फ्रस्टेशन दूसरों पर उतारने लगता है। ऐसे मे व्यक्ति हमेशा थका-थका व बीमार महसूस करता है। लगातार सिर और मांसपेशिओ मे दर्द, भूख व नींद मे कमी होने लगती है। अपने कार्य मे रुचि मे कमी, हमेशा असफलता का डर, अपना हर दिन बेकार लगने लगता है। ऐसे व्यक्ति दूसरों के साथ जरूरत से ज्यादा कठोर, असहनशील और चिड़चिड़ा हो जाता है। गैस्ट्रिक व ब्लड-प्रेशर का उतार-चढ़ाव असामान्य हो जा सकता है।
ऐसे परिवर्तनो का मतलब है कि अपने शारीरिक व मानसिक कार्य भार को सही तरीके से संभालने की जरूरत है। अगर संभव है तो कार्य-भार को कम कर देना चाहिए। साथ ही अपने लाइफ-स्टाइल को संयमित करना कहिए। अपनी आवश्यकताओ तथा समस्याओं को समझ कर उनका ध्यान रखना चाहिए।
समाधान-
ऐसी समस्याए अक्सर काम को लत (वर्कहोलिक) बना लेने वाले लोगों में ज्यादा पाया जाता है। इसलिए काम के साथ-साथ मनोरंजन, रचनात्मकता, मित्रों और परिवार के साथ समय बिताना भी जरूरी है। जीवन की खुशिया मानसिक तनाव काम करती है। हर काम का ध्येय सिर्फ जीत-हार, जल्दीबाजी या लक्ष्य-प्राप्ति नहीं रखना चाहिए। सकारात्मक सोच और दूसरों को समझने की कोशिश भी आवश्यक है। जिंदगी की परेशानियों और समस्याओं को सही नजरिए से समझना भी जरूरी है। समस्याओं से बचने के बदले उनका सामना करना चाहिए। काल्पनिक दुनिया से हट कर वास्तविकता और जरूरत के मुताबिक कठिनाइयों को सुलझाना चाहिए। कार्य-स्थल पर टीम मे काम करना, अपनी समस्यओं को बताना, नयी जिम्मेदारियों को सीखना भी सहायक होती है। कुछ लोग ‘ना’ नहीं बोल पाने के कारण अपने को काम के भार तले दबा लेते है। ‘ना’कहना सीखना चाहिए।
प्राणायाम, योग, योगनिद्रा, ध्यान, मुद्रा आदि की भी मदद ली जा सकती है। इससे तनावमुक्ति होती है। स्फूर्ति और आत्मविश्वास बढ़ता है। यह पूरे व्यक्तित्व को सकारात्मक और रचनात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। आयुर्वेद मे तुलसी को नर्व-टानिक तथा एंटिस्ट्रैस कहा गया है। अतः इसका भी सेवन लाभदायक हो सकता है,पर गर्भावस्था में बिना सलाह इसे ना लें।
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