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वाक़ई कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है रेखा जी। जो अपने आपको अपरिहार्य (indispensable) मान लेते हैं, वे ऐसा करके निश्चय ही किसी और को नहीं वरन स्वयं को ही छलते हैं।स्वर्गीय कुँअर बेचैन जी की एक भिन्न संदर्भ में रची गई ग़ज़ल का एक शेर है:
कोई-न-कोई रोज़ ही करता है ख़ुदकुशी
क्या बात है कि झील में हलचल नहीं कुँअर
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बहुत ख़ूब! उम्दा शेर है।
कोई रहे ना रहे, दुनिया तो हर हाल में चलती रहती है। ऐसे लोग दूसरों को भी अपने अहंकार से तकलीफ़ देते रहते हैं। लेकिन क्या किया जाए। इस दुनिया में हर तरह के लोग हैं।
शुक्रिया जितेंद्र जी, आपके विचारों के लिए और स्वर्गीय कुँअर बेचैन जी के शेर के लिए भी।
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