गिनती बन कर रह गए!

श्रम के सैनिक निकल पड़े पैदल, बिना भय के बस एक आस के सहारे – घर पहुँचने के सपने के साथ. ना भोजन, ना पानी, सर पर चिलचिलाती धूप और रात में खुला आसमान और नभ से निहारता चाँद. पर उन अनाम मज़दूरों का क्या जो किसी दुर्घटना के शिकार हो गए. ट्रेन की पटरी पर, रास्ते की गाड़ियों के नीचे? या थकान ने जिनकी साँसें छीन लीं. जो कभी घर नहीं पहुँचें. बस समाचारों में गिनती बन कर रह गए.

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9 thoughts on “गिनती बन कर रह गए!

  1. न जाने कितने छाती पीट रहे होंगे
    और कितने
    अब भी आने का इंतजार,
    आंगन बुहार रहे होंगे,
    बिस्तर सजा रहे होंगे,
    वर्षों बाद कोई घर आ रहा था,
    बाते नहीं हो पाई थी,
    बैटरी डाउन थी
    मोबाइल की,
    उसे क्या मालूम कि
    जिंदगी की बैटरी डाउन हो गई है,
    जो अब कभी रिचार्ज नहीं होगा।

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    1. यह स्थिती बङी दुःखद है। सोंच कर हीं दिल ङूबने लगता है। ना जाने इन लोग ने क्या-क्या तकलीफें देखीं होंगी। आभार इन मार्मिक पंक्तियों के लिये।

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