दफ्न पन्ने और बंद किताबें

यादें धुंधली पड़ती हैं समय के साथ,
आंखों की रोशनी धुंधली पड़ती है समय के साथ,
पर
यादों से 
तारीखे   क्यों नहीं धुंधली पड़ती?
जिंदगी के किताब से?
ना जाने क्यों हम खोलते हैं ,
दफ्न पन्नों और बंद किताबों को बारंबार ।

 

9 thoughts on “दफ्न पन्ने और बंद किताबें

  1. पर तारीखे क्यों नहीं धुंधली पड़ती?
    जिंदगी के किताब से?

    tarikho ki jagah yaad yadein jyada better word rahega

    bahut thoughtful ..loved it 🙂

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    1. कुछ खट्टी- मीठी तारीख़ें ज़िंदगी के साथ जुट जातीं हैं. चाह कर भी भूला नहीं जा सकता .
      तुम्हारा सुझाव अच्छा लगा . Thanks.

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  2. आपकी इस बात पर तो मैं कुछ नहीं कह सकता रेखा जी लेकिन एक शेर याद आ रहा है :

    मिट चले मेरी उम्मीदों की तरह हर्फ़ मगर
    आज तक तेरे ख़तों से तेरी ख़ुशबू न गई

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    1. इन ख़ूबसूरत पंक्तियों के लिए आभार जितेंद्र जी.
      बड़ा तकलीफ़देह है यह विरोधाभास .हम सब यादों से भागते भी है और उन में डूबना भी चाहते हैं.

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