अंश

कई बार मर- मर कर जीते जीते,
मौत का डर नहीं रहता.
पर किसी के जाने के बाद
अपने अंदर कुछ मर जाता है.
….शायद एक अंश अपना.
वह ज़िंदगी का ना भरने वाला
सबसे बड़ा ज़ख़्म, नासूर  बन जाता है.

 

21 thoughts on “अंश

      1. ज़िंदगी बहुत रंग दिखाती है. ढेरों सबक़ सिखाती है. इस दुनिया का यही नियम है.

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  1. तलत जी और लता जी के दिल को छू लेने वाले युगल गीत – ‘जब जब फूल खिले तुझे याद किया हमने’ का एक अंतरा है :

    मन को मैंने लाख मनाया
    पर अब तो है वो भी पराया
    ज़ख़्म किये नासूर
    तेरी याद के मरहम ने

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    1. आभार आपको !
      लिखने वाले को दाद देनी होगी. ये पंक्तियाँ बिलकुल सहीं बातें कहती हैं.

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  2. एक आम इंसान के लिए स्मृतियाँ ही सबकुछ हैं उनके बाहर कुछ भी नहीं ।इसीलिए तो जब कोई नहीं होता उसकी स्मृतियाँ उसे ज़िंदा रखती हैं ,और लोगों की स्मृतियों में हम ज़िंदा रहते हैं।इसके इतर तो सिर्फ वर्तमान है भूत भविष्य कुछ भी नहीं।

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      1. मैं अपने अंदर की ख़ुशियाँ और ग़म पन्नों पर उतार आगे बढ़ने की कोशिश में हूँ. वरना इस व्यस्त दुनिया में किसे समय है इन बातों के लिए .
        आभार .

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      1. बहुत अच्छी तो नहीं हूँ पर ठीक होने की कोशिश में हूँ.
        तुम कैसी हो मैथिली.

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