शिकायत

गिला है कि हम नहीं मिला करते.

अपने लिए जीने से शिकायत क्यों ?

अँधेरे से निकल उजाले में जाने

की कोशिश से नाराज़गी क्यों ?

मंदिर…. मस्जिद में भटकने से ज़्यादा

अगर क़रार, सुकून है,

अपने आप से मिलने में

अपने अंदर, अंतर्मन की यात्रा में?

तो शिकायत क्यों ?

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