ख़्वाहिशों की फ़सलें

चाहो या ना चाहो,

ख़्वाहिशों की फ़सलें

बेतरतीब उगतीं रहतीं हैं.

बिन पानी..बिन बरसात.

ना बदलते मौसमों का डर

ना पतझडों का असर.

11 thoughts on “ख़्वाहिशों की फ़सलें

  1. सही कहा आपने , ख़्वाहिश का ‘उग’ आने का ना कोइ मौसम होता है ना समय! 
    ख़्वाहिशें अधिकतर होती हैं छोटी छोटी 
    जब पूरी ना हों तो लगती हैं गगनचुंबी

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