
कई बार लगता है,
ऊपर वाला कुछ
लोगों को ज़िंदगी में
हमारा इम्तहान
लेने भेजता हैं।
जब तक हम अपने लिए
हौसले के साथ खड़ा होना
नहीं सीख लेते।
यह इम्तहान चलता रहता है।

कई बार लगता है,
ऊपर वाला कुछ
लोगों को ज़िंदगी में
हमारा इम्तहान
लेने भेजता हैं।
जब तक हम अपने लिए
हौसले के साथ खड़ा होना
नहीं सीख लेते।
यह इम्तहान चलता रहता है।

ज़िंदगी रोज़ एक ना एक
सवाल पूछती है।
सवालों के इस पहेली में
उलझ कर, जवाब ढूँढो।
तो ये सवाल बदल देती है।
ज़िंदगी रोज़ इम्तहान लेती है।
एक से पास हो या ना हो।
दूसरा इम्तहान सामने ला देती है।
अगर खुद ना ले इम्तहान,
तो कुछ लोगों को ज़िंदगी में
इम्तहान बना देती है।
बेज़ार हो पूछा ज़िंदगी से –
ऐसा कब तक चलेगा?
बोली ज़िंदगी – यह तुम्हारा
नहीं हमारा स्कूल है।
तब तक चलेगा ,जब तक है जान।
बस दिल लगा कर सीखते रहो।

समुंदर की लहरें,
जमीं का ज़ख़्म भरने की
कोशिश में मानो बार बार
आतीं-जातीं रहतीं है।
वक्त भी घाव भरने की
कोशिश करता रहता है।
ग़र चोट ना भर सका,
तब साथ उसके
जीना सिखा देता है।

चाँद झुका,
खुले वातायन से
झाँक मुस्कुराया।
बोला, हमें लगता था
हम हीं अकेले दमकते हैं।
यहाँ तो और भी है,
कोई तनहा, तन्हाई
में मुस्कुरा रहा है।

नज़रें झुका कर,
उठा कर,
पलकें झपका
कर अश्कों को क़ाबू
करना सीखा था, पर
आँखें ऐन वक्त पर
धोखा दे गईं।
जब आँखों को आँखें दिखाईं,
जवाब मिला
हमारी नहीं जज़्बातों
की ख़ता है।

ज़िंदगी ने कहा,
ध्यान से पढ़ो मेरा सबक़ ।
ये नसीहत
हमेशा काम आएँगे।
वरना इम्तहान
बार-बार होता रहेगा।

कल तक कंकर था।
तराश कर हीरा बन गया।
कल तक कंकर था।
बहती नर्मदा में ,
तराश कर शंकर बन गया।
तराशे जाने में दर्द है,
चोट है।
पर यह अनमोल बना देता है।

आना-जाना जीवन
का दस्तूर है।
ग़म ना कर।
मौसम, साल, महीने, दिन…
लोग बदलते रहतें हैं।
रोज़ बदलती दुनिया
में अपने बने रहें।
जिनसे दुख-सुख कह ले,
कभी हँस ले,
कभी रो ले,
यह अपनापा बना रहे।
Happy 31 st December!!!

हम सब कई बार टूटते और जुटते हैं। इस दौरान अपने अंदर के हम से हमारी मुलाक़ातें होतीं हैं, बातें होतीं हैं । मुस्कुरा कर मिलते रहो हर दिन अपने आप से। गुफ़्तगू करते रहो अपने आप से। वे पल, वे मुलाक़ातें बहुत कुछ सिखा और मज़बूत बना जायेंगीं।

पीले पड़ कर झड़ेंगे
या कभी तेज़ हवा का
कोई झोंका ले जाएगा,
मालूम नहीं।
पत्ते सी है चार दिनों
की ज़िंदगी।
पतझड़ आना हीं है।
फिर भी क्या
तिलस्म है ज़िंदगी ।
सब जान कर भी
नीड़ सजाना हीं है।
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