अधूरी ख्वाहिशें

क्यों कुरेदते हो

पुरानी बातें?

रूह पर उकेरे

यादों और दर्द के,

निशां कभी मिटते हैं क्या ?

खुरच कर हटाने की

कोशिश में कुछ ज़ख़्मों

के निशां रह जातें हैं

नक़्क़ाशियों से।

कई अधूरी ख़्वाहिशें,

गहनों में जड़े नागिनों सी

अपनी याद दिलाती हैं।

जब करो चर्चा,

गुज़रते हैं उसी दौर से।

ज़िंदगी के रंग – 220

घर के छत की ढलाई

के लिए लगे बल्ले, बाँस

और लकड़ियों के तख़्ते ने

बिखरे रेत-सीमेंट को

देख कर कहा –

हम ना हो तो तुम्हें

सहारा दे मकान का

छत कौन बनाएगा?

कुछ दिनों के बाद

मज़बूत बन चुका छत

बिन सहारा तना था।

और ज़मीन पर बिखरे थे

कुछ समय पहले

के अहंकार में डूबे बाँस,

बल्ले और तख़्तियाँ।

ज़िंदगी रोज़ नए रंग दिखाती है ।

भरोसा और यक़ीं

उनसे सच की

क्या उम्मीद करना,

जो ख़ुद से भी झूठ बोलतें हैं?

बड़े सलीक़े से झूठ बोलते हैं।

तय है, हर लफ़्ज़ से, बेख़ौफ़ टपकते झूठ का हुनर ,

मुद्दतों में सीखा होगा।

वे हमें नादाँ कहते हैं।

हैं नादान क्योंकि

हमने भी भरोसा करना ,

यक़ीं करना अरसे

से सीखा है।

दिल-ओ-दिमाग़

चोट से टूटे दिल से,

दिमाग़ ने पूछा –

तुम ठीक हो ना?

तुम्हें बुरा नहीं,

ज़्यादा भला होने की

मिली है सज़ा।

ऐसे लोगों की

दुनिया लेती है मज़ा।

पेश नहीं आते दिल से,

दिमाग़ वालों से।

प्यार करो अपने आप से,

मुझ से।

ज़िंदगी सँवर जाएगी।

बाती और चराग

बाती की लौ भभक

कर लहराई।

बेचैन चराग ने पूछा –

क्या फिर हवायें सता रहीं हैं?

लौ बोली जलते चराग से –

हर बार हवाओं

पर ना शक करो।

मैं तप कर रौशनी

बाँटते-बाँटते ख़ाक

हो गईं हूँ।

अब तो सो जाने दे मुझे।

मंज़िल

मंज़िल

यक़ीं करो अपने आप पर।

और नज़र रखो मंज़िल पर।

इस दुनिया में इतना

है टोका-टोकी।

ग़र लोगों की बातें

सुनते रहे,

मंज़िल तक नहीं

पहुँच पाएँगे कभी।

चुभन

दे कर चुभन और

हाल पूछते हैं।

ना मिलने पर

सवाल पूछतें हैं।

कुरेदतें हैं,

ज़ख्मों को

मलहम के बहाने।

उन लोगों का

क्या किया जाए?

शीश महल

शीशमहल

कौन खोजता हैं दूसरों में

कमियाँ हीं कमियाँ ?

उसमें अपने आप को

ढूँढने वाले।

यह शीश महल

देखने जैसा है।

जिधर देखो अपना हीं

अक्स और परछाइयाँ

देख ख़ुश हो

लेते है ये लोग।

लोग

लोग

ज़िंदगी की राहों में

लोगों को आने दो

….. जाने दो।

सिर्फ़ उनसे मिले

सबक़ अपना लो।

राहों में मिले टेढ़े-मेढ़े

लोग सीधे चलने की

सबक़ औ समझ दे जाएँगे।

सोना या कुंदन

कुंदन

ज़िंदगी के इम्तहानों में

तप कर सोना बने,

कुंदन हुए या

हुए ख़ाक।

यह तो मालूम नहीं।

पर अब महफ़िलें

उलझतीं नहीं।

बेकार की बातें

रुलातीं नहीं।

ना अपनी ख़ुशियाँ

कहीं और ढूँढते हैं ,

ना देते है किसी

को सफ़ाई ।

हल्की सी

मुस्कान के साथ,

अपनी ख़ुशियों पर

यक़ीं करना सीख रहें हैं।