जो मिला उसमें जीना सीखा लिया।
जो ना मिला उसमें गुज़ारा करना सीख लिया।
चाहना, पसंद करना छोड़ना सीख लिया।
घूमते रही इर्दगिर्द तुम्हारे,
घड़ी की सुइयों की तरह।
क्या अपने आप को था जीत लिया?
या खो दिया अस्तित्व अपना?
यही होती है बज़्म-ए-हस्ती औरत की।

जो मिला उसमें जीना सीखा लिया।
जो ना मिला उसमें गुज़ारा करना सीख लिया।
चाहना, पसंद करना छोड़ना सीख लिया।
घूमते रही इर्दगिर्द तुम्हारे,
घड़ी की सुइयों की तरह।
क्या अपने आप को था जीत लिया?
या खो दिया अस्तित्व अपना?
यही होती है बज़्म-ए-हस्ती औरत की।

सच को जो झूठ बताए,
शोर मचा झूठ को सच बनाए।
सुन कर अनसुना करे,
ऐसे रिश्ते क्यों निभाएँ?
जाना नहीं उन राहों पर,
जहाँ मिले अपमान बारंबार।
जो बदले मौसम सा हर बार,
क्यों करना उस पर ऐतबार?

प्लास्टिक हीं प्लास्टिक है चारों ओर।
चाहे जितना मचा लो शोर।
आज धरा की ख़ुदाई में मिलते हैं प्राचीन अवशेष।
कुछ सौ साल बाद क्या रहेगा शेष?
ख़ुदाई में मिलेंगे क्या प्लास्टिक के मानव अवशेष?

दुनिया से नाराज़ होना छोड़ दिया अरसे पहले।
अब अपने आप से भी नाराज़ नहीं होते।
बात ऐसी नहीं कि ज़िंदगी हसीन हो गई है।
बात बस इतनी है कि
मुहब्बत करने लगे हैं अपने-आप से।
ख़ुशी की बात हो, कि ग़मों की,
सब से पहले, गुफ़्तगू अपने आप से करते हैं।
हौसला अफजाई अपने आप की करते हैं।
Positive Psychology –
Our most important relationship
is with our inner voice- Our internal
monologue shapes mental wellbeing,
says psychologists.

तारों की कहकशाँ से सजी रात है,
आकाश में छिटके चाँद-तारे, शरद पूर्णिमा की रात।
धरा पर राधा -कान्हा करते महारास,
वृंदावन की अद्भुत धूम में महारासलीला की रात।
आध्यात्म और प्रेमोत्सव की निराली रात।
सोलह कलाओं से पूर्ण चंद्रमा की,
बिखरी चाँदनी में गोपियाँ नाचती रही,
बरसात रहा अमृत सारी-सारी रात।
रक़्स…नृत्य में डूबी तारों भरी रात है।
(अश्विन शुक्ल पक्ष पूर्णिमा / शरद पूर्णिमा, रविवार, 09 अक्टूबर 2022 )

मेरी माटी-मूरत पूजा तुम ने।
……सजाया-सँवारा,
दिया अपरिमित प्यार औ सम्मान
…..दस दिन।
कुछ अंश उसका रखा ना बचा कर?
मेरे जीते-जगाते, हाड़-मास …….
स्वरूप के लिए?
Inspired by an English quote!

प्यासे मृग सी कशाकश में,
मृगतृष्णा के पीछे भागते
बीतती है दिन-रात।
कट जाती है ज़िंदगी फ़क़त
मरीचिका सी उलझन में।
बता वक्त ख़ता ढूँढे या सज़ा?

दो दिलों…रूहों की जुगलबंदी है इश्क़।
इश्क़ के हैं कुछ अदब-कायदे।
अज़ाब-ए-हिज्र-ओ-विसाल…
मिलन और वियोग में जीना
है सिखाती इश्क़ की जुगलबंदी।
टूट जाए यह जुगलबंदी,
फिर भी टूट कर जीना है सीखती।
एक दूसरे के लय-ताल पर
जीना है इश्क़-ए-जुगलबंदी।

Topic by YourQuote.
जैसे चाहो, जी लो ज़िंदगी।
वापस लौटने की नहीं है गुंजाइश,
बस इतनी है शर्त-ए-ज़िंदगी।

लोगों की ओर जल कर गिरते, बिखेरते आतिशो ने,
रावण से पूछा ये क्या कर डाला?
जवाब मिला –
तुम सब युगों-युगों से जला रहे है मुझे।
मैंने भी वही किया, तो बुरा क्यों मान गए?
सामने राम तो नज़र आए नहीं कहीं।
पर छुपे थे कईयों के अंदर अंश हमारे, कई रावण।

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