भरोसा

ज़िंदगी की हर जंग में,

हर महाभारत में आश्वस्त हैं।

क्योंकि जीवन के

हर सैलाब में तुम्हें साथ

ले कर चल रहें हैं।

भरोसा है,

जब तुमने जंग दिया है

तो जय दिलाने सारथी

बन तुम आओगे हीं।

ज़िंदगी के रंग -231

ज़िंदगी के जंग में,

जब हम अपना सम्मान करना,

अपने लिए खड़े होना

सीखने लगते है।

तब कई लोग हम से

दूर हो जातें है।

वे साथ नहीं छोड़ते

क्योंकि वे कभी

साथ थे हीं नहीं।

बस दिखने लगती है

सब की फ़ितरत।

जो अपने हैं,

वो तो हमेशा

साथ खड़े मिलेंगे।

Why We Love Narcissists – Have you ever wondered why selfish, arrogant, and entitled individuals are so charming? These narcissistic people have parasitic effects on others/ society. Narcissists manipulate credit and blame in their favor.
Research by January 15, 2014

दिल की बातें

किसी और की बातों

और राय को बोझ

ना बनने दो।

सुन सब की लो।

पर सुनो अपने दिल की।

बादल

खुले आसमान में,

जलद …. जल भरे हलके

बादलों को आज़ाद,

ऊपर उठते देखा है।

सात रंग बिखेरते

इंद्रधनुष बनते-बनाते

देखा है।

जैसे हीं वे अपने

अंदर के पानी को बोझ

बना लेतें हैं।

पल भर में पानी बन

वही जा गिरते हैं।

जहाँ से ऊँचाइयों

पर पहुँचें थे।

ज़िंदगी के रंग – 229

ख़ुशियों के खोज़ में

गुज़रती जा रही है ज़िंदगी।

कितनी गुजारी यादों में

कितनी कल्पना में ?

है क्या हिसाब?

ग़र आधी ज़िंदगी गुज़ारी

अतीत के साये में

और भविष्य की सोंच में।

फिर कैसे मिलेगी ख़ुशियाँ ?

और कहते है –

चार दिनों की है ज़िंदगी,

चार दिनों की है चाँदनी ।

Wandering mind not a happy mind ( A research result)

Harvard psychologists Matthew A. Killingsworth and Daniel T. Gilbert used a special “track your happiness” iPhone app to gather research. The results: We spend at least half our time thinking about something other than our immediate surroundings, and most of this daydreaming doesn’t make us happy.

About 47% of waking hours spent thinking about what isn’t going on.

https://news.harvard.edu/gazette/story/2010/11/wandering-mind-not-a-happy-mind/

इश्क़

कुछ मोहब्बतें

जलतीं-जलातीं हैं।

कुछ अधुरी रह जाती हैं।

कुछ मोहब्बतें अपने

अंदर लौ जलातीं हैं।

जैसे इश्क़ हो

पतंग़े का चराग़ से,

राधा का कृष्ण से

या मीरा का कान्हा से।

स्याह रात

जाड़े की सुबह बादलों

से लुकाछुपी खेलती

सुनहरी धूप सरकती,

पैरों तक आ उसे

गुनगुना कर गई।

ख़ुश-गवार, फ़िज़ा परिंदों

की चहचहाहट…. हर सुबह

एक नई रंग ले कर आती है।

स्याह रात के ख़िलाफ़

जंग जीत कर आती है।

ठहराव

तकरार औ इकरार हो,

शिकवे और गिले भी।

पर ठहराव हो, अपनापन,

भरोसा और सम्मान हो,

ग़र निभाने हैं रिश्ते।

वरना पता भी नहीं चलता।

आहिस्ता-आहिस्ता,

बिन आवाज़

बिखर जातें हैं रिश्ते,

टूटे …. शिकस्ते आईनों

की किर्चियों से।

इम्तहान

कई बार लगता है,

ऊपर वाला कुछ

लोगों को ज़िंदगी में

हमारा इम्तहान

लेने भेजता हैं।

जब तक हम अपने लिए

हौसले के साथ खड़ा होना

नहीं सीख लेते।

यह इम्तहान चलता रहता है।

ज़िंदगी के रंग -228

ज़िंदगी रोज़ एक ना एक

सवाल पूछती है।

सवालों के इस पहेली में

उलझ कर, जवाब ढूँढो।

तो ये सवाल बदल देती है।

ज़िंदगी रोज़ इम्तहान लेती है।

एक से पास हो या ना हो।

दूसरा इम्तहान सामने ला देती है।

अगर खुद ना ले इम्तहान,

तो कुछ लोगों को ज़िंदगी में

इम्तहान बना देती है।

बेज़ार हो पूछा ज़िंदगी से –

ऐसा कब तक चलेगा?

बोली ज़िंदगी – यह तुम्हारा

नहीं हमारा स्कूल है।

तब तक चलेगा ,जब तक है जान।

बस दिल लगा कर सीखते रहो।