
मान कर चलो कि ज़िंदगी में अच्छा…
सबसे अच्छा समय
अभी आना बाकी है।
अपने अंदर की रौशनी
कभी मरने न दो।
तुम्हारा अपना सर्वश्रेष्ठ
करना ही काफी है।

मान कर चलो कि ज़िंदगी में अच्छा…
सबसे अच्छा समय
अभी आना बाकी है।
अपने अंदर की रौशनी
कभी मरने न दो।
तुम्हारा अपना सर्वश्रेष्ठ
करना ही काफी है।
ऐसा भी क्या जीना?
पूरी ज़िंदगी साथ गुज़र गई।
पर ना अपने आप से बात हुई,
ना तन की रूह से मुलाक़ात हुई।

दीया
हर दीया की होती है,
अपनी कहानी।
कभी जलता है दीवाली में,
कभी दहलीज़ पर है जलता,
गुजरे हुए की याद का दीया
या चराग़ हो महफ़िल का
या हो मंदिर का।
हवा का हर झोंका डराता है, काँपते लहराते एक रात जलना और ख़त्म हो जाना,
है इनकी ज़िंदगी।
फिर भी रोशन कर जाते है जहाँ।

चढ़ते सूरज के कई हैं उपासक,
पर वह है डूबता अकेला।
जलते शोले सा तपता आफ़ताब हर रोज़ डूबता है
फिर लौट आने को।
इक रोज़ आफ़ताब से पूछा –
रोज़ डूबते हो ,
फिर अगले रोज़
क्यों निकल आते हो?
कहा आफ़ताब ने –
इस इंतज़ार में,
कभी तो कोई डूबने से
बचाने आएगा।

अभी तक लगता था
मर रहीं हैं नदियाँ,
गल रहें हैं ग्लेशियर,
धुँधले हो रहे हैं अंतरिक्ष,
कूड़ेदान बन रहे है सागर,
धरा और पर्वत…..
इंसानों की मलिनता से।
अब समझ आया
कई देश भी मर रहे हैं।
फ़र्क़ पड़ता है,
और दर्द होता है,
सिर्फ़ भुक्तभोगियों को।
बाक़ी सब जटिल जीवन के
जद्दोजहद में उलझे है।
विश्व राजनीति की पहेली है अबूझ।

फूलों की पंखुड़ियाँ!!!
अगर टूटने की चाहत नहीं,
तब किसी से
इतना जुटना नहीं कि
रिश्ते खंडित होते
स्वयं भी खंडित हो जाओ …..
झड़ते फूल की पंखुड़ियों
सा बिखर जाओ।
आपने अपने आप को आईने में देखा ज़िंदगी भर।
एक दिन ज़िंदगी के आईने में प्यार से मुस्कुरा कर निहारो अपने आप को।
अपने को दूसरों की नज़रों से नहीं, अपने मन की नज़रों से देखा। कहो, प्यार है आपको अपने आप से!
सिर्फ़ दूसरों को नहीं अपने आप को खुश करो।
रौशन हो जाएगी ज़िंदगी।
जी भर जी लो इन पलों को।
फिर नज़रें उठा कर देखो। जिसकी थी तलाश तुम्हें ज़िंदगी भर,
वह मंज़िल-ए-ज़िंदगी सामने है। जहाँ लिखा है सुकून-ए-ज़िंदगी – 0 किलोमीटर!

कुछ समझदारों को कहते देखा है- बात ना पकड़ो !!!!!
पर खुद ऐसे लोगो को हमेशा
बातें पकड़तें देखा,
बातें बनाते भी देखा।
इससे इनके रिश्ते भले छूट जाएँ
या अपने टूट जायें।
ऐसे में यह मुहावरा याद आता है – “पर उपदेश, कुशल बहुतेरे।”

अक्सर लोगों ने कहा –
पुरानी बातें ना दोहराओ ।
पर क्यों?
हम सब रामायण, गीता और महाभारत दोहरातें हैं,
समझ और ज्ञान पाने, ग़लत बातों
को ग़लत बताने के लिए।
अनुचित करने वाले अपनी त्रुटि
छुपाने के लिए ये सब कहते हैं!
ग़लतियाँ करने से क्यों नहीं डरते हैं।
ऐसे लोगों को ग़लत हरकतें
कर नई बातों की उम्मीद क्यों?

You must be logged in to post a comment.