शुभ शिवरात्रि- सत्यं शिवं सुन्दरम् !

कहते हैं विध्वंस के बाद दुनिया रचने

के लिए शिव ने बजाया डमरू।

जिसका नाद या स्वर, सृजन का आधार बना।

यह स्वर आज भी फ़िज़ा में गूँज रहा है।

स्वर नाद बन कर।

स्वर साधना या नाद साधना मार्ग है,

ग़र पाना है नीलकंठ, शिव को।

पाना है सत्य को, वास्तविक सौंदर्य को।

पाना हो सत्यं शिवं सुन्दरम् को।

Happy Shivratri !

चंद्रशेखर आज़ाद – बलिदान दिवस

ख़ुश रहने के लिए

खुशियां न तो मिलती है हाट-बाज़ार में|

ना पढ़ाया जाता है किसी पाठशाला में |

कुछ समय की खुशियाँ पा सकते हैं,

मादक नशा, और दुनियावी बातों में।

पर हमेशा खुश रहने के लिए,

झाँकना पड़ता है अपने दिल में।

अगर दिल औ रूह में रूहानियत हो,

तो हर हाल में खुश रहना आ जाता है।

Topic by YourQuote.

जंग

जिन्हें जंग चाहिए, उन्हें हासिल होता है,

विनाश देख ख़ुशियाँ और अपने अहं की शांति ।

औरों को हासिल होता है दर्द और रक्तपात।

हम सबों को एक युद्ध…. लङाई… जंग लड़नी होगी ,

सभी लङाईयों को खत्म करने के लिये।

शांती लाने के लिये।

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गीला मन

आँसू बहाते नयन और गीला मन,
गिलाओं को बह जाने देता है।
आँसुओं से धुल दिल का दर्द

हलका हो जाता है।
ये पानी के क़तरे नहीं,

जज़्बात के आईने होतें हैं।
अश्क़ और जज़्बात दबाए रखना,
सैलाब रोकना है।
बहा दिया,
तो ज़िंदगी फिर से

ख़ूबसूरत नज़र आने लगती है।

मूल्य

ज़िंदगी को नहीं फ़िक्र, तुम कौन हो?
वह सब को एक जैसे सबक़ देती है।
कि ज़िंदगी की ख्वाहिशों को पूरा
करने के लिए मूल्य चुकाना पड़ता है।

सुकून भरा दिल और रूह

सुकून भरा दिल और रूह

चंद बूँदे बरसे आसमान से।

खुला आकाश फुसफुसाया कानों में।

चैन पाने के लिए चंद क़तरे हम भी बरस जाने देते हैं,

कालिमा भरे नभ से, स्वच्छ नभ पाने के लिए।

आज़ाद छोड़ दे एहसासों औ दर्द को

बरस कर बह जाने के लिए।

ग़र पाना है सुकून भरा दिल और रूह।

Psychological fact –

Normal crying is emotional cathartic. It does have a soothing and relaxing effect. When we cry, our heart rate and breathing slow down a little and we start to calm down. We might even experience a mood boost after a good cry. Crying is useful for helping people release and express their suppressed or repressed emotions.

(Dr J Chan, a clinical psychologist at the Hong Kong Psychological Counselling Centre in Mong Kok)

चाँद

चाँद, कई बार तुम आइने से लगते हो।

जिसमें अक्स झलक रहा हो अपना।

तुम्हारी तरह हीं अकेले,

अधूरे-पूरे और सुख-दुःख के सफ़र में,

दिल में कई राज़ छुपाए,

अँधेरे में दमकते,

अपने पूरे होने के आस में रौशन हैं।

लावा

धरती के दिल का दर्द जब फूट निकलता है। उबलते दर्द से पत्थर भी मोम सा पिघलता है। माणिक-पोखराज जैसे ख़ूबसूरत रंग लिए, आतशीं-लावा दमकता है। पास जाओ तो गरमाहट और आग बताती है, ज़मीं का क़तरा-क़तरा दर्द से लरज़ता है। दर्द भरा हर वजूद ऐसे हीं सुलगता है।

प्यार