जुबाँ

कभी कैक्टस, कभी पत्थर

बन जाती है नरम मुलायम जीभ।

कभी नर्म कभी गर्म, कभी ज़ख्म पर

मरहम सा सुकून भरा फाहा।

कभी घाव दे जाती है नाज़ुक जीभ।

कभी रिश्ते बनाती, कभी बिगाड़ती है।

कभी गुनाहगार कभी बेगुनाह निर्दोष बन जाती है।

शायद इसलिए ज़ुबान की दहलीज़ पर

लबों के पहरे होते हैं।

शायद इसलिए जुबाँ

कई दीवारों के पहरे में क़ैद रहती है।

ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोये।

औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए।। ~~ कबीर

ख्वाहिशें तो अनंत हैं!

क्यों आज़ लोग खुश और संतुष्ट नहीं?

क्यों लोग स्वयं को नहीं, दूसरों को देख रहें हैं?

आध्यात्मिक-मानसिक प्रगति से दूर,

भाग रहें हैं भौतिक प्रगति की ओर।

पर है स्वयं के गोली-बारी, हिंसा से लहू-लुहान।

गीता ने सदियों पहले बताया,

जो तुम्हारे पास है उसमें संतुष्ट, ख़ुश रहना सीखो,

क्योंकि ख्वाहिशें तो अनंत हैं।

सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।

मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः।।12.14।।

अर्थ- संयतात्मा दृढ़निश्चयी योगी सदा सन्तुष्ट है।

जो अपने मन और बुद्धि को मुझमें अर्पण किये हुए है?

वह मुझे प्रिय है। (भगवद् गीता अध्याय 12 श्लोक 14)

Salman Rushdie Stabbed In Neck At New York Event, Taken To Hospital. https://www.ndtv.com/world-news/author-salman-rushdie-attacked-on-stage-at-an-event-in-new-york-news-agency-pti-3249899/amp/1

ना तौल इंसा को!

नाप-तौल के रिश्ते निभाने वालों

हाथ में लिए तराज़ू,

ना तौल इंसाँ को।

ना भूल,

आकार, रूप, रंग हैसियत नहीं,

हुनर, स्वभाव और गुण काम आते हैं।

जैसे छोटे से छोटे भी अनमोल होते है

हीरा-स्वर्ण-जवाहरात ।

मृत यादें

मृत यादें मर कर भी दर्द देतीं है।

ग़र अतीत के घाव नहीं भरे

तो वे रिसते रहेंगे।

यादों के दाग,

ज़ख्मों के जलन

अपने होने का एहसास देते रहेंगे।

अतीत से समझौता कर

आगे निकल जाना ज़रूरी है।

हम सबसे ज़्यादा अपने हैं !

करो इश्क़ हर साँसों से,

साँसे ज़िंदगी…ताक़त है हमारी।

किसी और के फ़िक्र में ना टूटने दो दिल,

दिल अपना है।

चोट ना लगने दो अपने अंतरात्मा को।

रूह तुम्हारी है,

किसी भीड़ में ना गुम होने दो अपने आप को,

जब टूटने लगो ज़िंदगी में, ठहर कर,

एक गहरी साँस लो और आइने

में निहारो अपने आप को।

याद रखो, हम सबसे ज़्यादा अपने हैं।

बूँद-बूँद

आभार

कहते है आभार देते समय रहता मन शुद्ध सात्विक।

क्योंकि शुक्रगुज़ार होंने के वक्त

हम सब के साथ होती है सकारात्मक ऊर्जा।

आभार देते वक्त, शिकवे-गिले आते नहीं हैं ज़ेहन में।

अब विज्ञान के ख़यालात भी लगे हैं मिलने।

वे भी मानने लगें हैं, शुक्रिया कैसे भी अदा करो।

लफ़्ज़ों से, मन हीं मन या दिल से।

ख़ूबसूरती, सुकून और ख़ुशियाँ भरी होती है उनमें।

positive psychology research – gratitude is strongly and consistently associated with greater happiness. Gratitude helps people feel more positive. Giving thanks can make you happier – Harvard Health

“गुरु मतंग और शबरी” Happy Guru Purnima!

“इंतज़ार आत्मा से हो तो पूरी होती हैं” – शबरी से राम ने कहा। “रावण तो बहाना है। कुछ कहानियाँ रची जातीं हैं, युगों-युगों तक कहे जाने के लिए। वे इतिहास बन जाती हैं । लीला तो रची जाती हैं, इंसानों को समझाने के लिय। रावण तो बस बहाना है। मुझे तेरे पास आना था।”

फिर कहा राम ने – “पशु बली से द्रवित होते हैं क्या वनों में बसे भील? क्यों हुई द्रवित तू? क्यों यौवन में किया गृह त्याग? तेरी पुकार कैसे करता मैं अनसुनी। चल कर आया तुम तक। बताने तुझे, ना रहता है यौवन-सौंदर्य, ना ऊँच-नीच।सिर्फ़ रह जाती है अटूट भक्ति, जब श्रमणा बन जाती है शबरी।”

तेरे एक रक्त बूँद से दरिया हुआ रक्ताभ और तेरे हीं चरण रज से जल हुआ स्वच्छ। तब भी नहीं जाना तुने क्या अपना तप और बल? ना तूने मुझे देखा, ना जाना। बरसों से, मेरे जन्म पूर्व से ताकती रही राहें मेरी। चखती-चुनती मीठे बेर, सजाती रोज़ पुष्प। सोंच, ना जाने किस पल आ जायें राम? समाधिस्थ होते गुरु मतंग के आशीष के भरोसे प्रतिक्षारत – “राम करेंगे तेरी चिंता और धरेंगे ध्यान और दिलाएँगे मोक्ष। ना ढूँढ उन्हें, वे ढूँढेंगे तुझे।”

शबरी, काल को तुने नहीं जाना क्या? देता नहीं किसी को एक पल ज़्यादा, ना एक पल कम। आयु पूरी होते ले जाने का बना लेता है बहाना।ना भ्रम में रह। रावण भी जाता किसी ना किसी विधि संसार से। रावण तो एक बहाना था। अम्मा, मुझे तो तेरे पास आना था।

शुभ गुरु पूर्णिमा !!

रेत-औ-रज

पैरों में लगे धूल झड़ाते, पूछा उनसे-

क्यों बिखरे हो यूँ? राहों में पड़े हो पैरों तले?

खिलखिला कर राहों के रज ने कहा –

कभी बन जाओ ख़ाक…माटी।

हो जाओ रेत-औ-रज,

ईश्वर और इश्क़ की राहों पर।

समझ आ जाएगा,

ना खबसूरती रहती है, ना जुनून।

जब अहं खो जाए, हो जाए इश्क़ उससे।

दुनिया हसीन बन जाती है गर्द बन कर।

ज़र्रा-ज़र्रा मुस्कुरा उठता है।

शुभ रथ यात्रा! Happy Rath yatra!!

पुरी, धरा का बैकुंठ, पूर्ण करता यात्रा चार-धाम।

जहाँ निकलते है भाई-बहन

जगन्नाथ, सुभद्रा, , बलराम

नगर भ्रमण को, शुक्ल पक्ष, द्वितीया आषाढ़ मास।

जगन्नाथ दारु -नीम काष्ठ बने रथ गरुड़ध्वज पर,

बलराम तालध्वज, सुभद्रा दर्पदलन’- पद्म रथ पर।

रूप मनभावन, विशाल नेत्र मंगल आशिष परिपूर्ण।

रथों को खींचते भक्त भाग्यवान।

ढोल, नगाड़ों, तुरही, शंखध्वनि से गूंजे धाम।

Ratha Jatra/ yatra is a Hindu festival associated with Lord Jagannath held at Shri Kshetra Puri Dham in the state of Odisha, India. It is the oldest Ratha Yatra, whose descriptions can be found in Brahma Purana, Padma Purana, and Skanda Purana and Kapila Samhita.