नज़्म-ए-ज़िंदगी अधूरी रह गई

कुछ कहना था, कुछ सुनना था।

पर बात अधूरी रह गई।

क़िस्सा-ए-इश्क़ छेड़ा,

पर कहानी अधूरी रह गई।

क्या शिकवा आल्फ़ाज़ो और

लफ़्ज़ों की ग़र वे अनसुनी रह गई।

जब नज़्म-ए-ज़िंदगी अधूरी रह गई।

सर्वोतम या उत्कृष्ट?

अपूर्णता में भी पूर्णता हैं,

कमियों में भी सौंदर्य।

जुनून में होता है नशा।

धुन में होती है खुमारी।

सर्वोतम या उत्कृष्ट होने से

बेहतर है सच्चा होना।

तन्हा तन्हा सफ़र

जहान में आए तन्हा,

जाना है यहाँ से तन्हा।

तन्हाई अकेलापन नहीं, है एकांत।

ग़र मिलना है ख़ुदा से, ख़ुद से।

तन्हाईयाँ हीं मुलाक़ात हैं करातीं।

अक्सर जीवन का सफ़र होता है क़ाफ़िले में,

फिर भी होती हैं दिल में तनहाइयाँ।

मिलो सबों से,

पर करो अपने साथ सफ़र।

ना जाने क्यों ख़ूबसूरत तन्हाईयाँ हैं बदनाम।

इंतज़ार है!

इंतज़ार है, वो दिन कब आएगा,

जब यह दिन ना पड़े मनाना।

जलते चराग़ सा ए’तिबार है,

मुद्दत से देखते ख़्वाब का आसार है।

जब बराबर की ज़िंदगी हो,

बराबर का मान हो।

इंतज़ार है उस दिन का……

11th October 2022: International

Day of the Girl Child. The theme

for the 2022 International Day of

the Girl Child was “Digital

generation: Our generation.”

क्यों करें ऐतबार?

सच को जो झूठ बताए,

शोर मचा झूठ को सच बनाए।

सुन कर अनसुना करे,

ऐसे रिश्ते क्यों निभाएँ?

जाना नहीं उन राहों पर,

जहाँ मिले अपमान बारंबार।

जो बदले मौसम सा हर बार,

क्यों करना उस पर ऐतबार?

प्लास्टिक बनते इंसान

प्लास्टिक हीं प्लास्टिक है चारों ओर।

चाहे जितना मचा लो शोर।

आज धरा की ख़ुदाई में मिलते हैं प्राचीन अवशेष।

कुछ सौ साल बाद क्या रहेगा शेष?

ख़ुदाई में मिलेंगे क्या प्लास्टिक के मानव अवशेष?

रूह-ए-दुर्गा-2

मेरी माटी-मूरत पूजा तुम ने।
……सजाया-सँवारा,
दिया अपरिमित प्यार औ सम्मान
…..दस दिन।
कुछ अंश उसका रखा ना बचा कर?
मेरे जीते-जगाते, हाड़-मास …….

स्वरूप के लिए?

Inspired by an English quote!

शर्त-ए-ज़िंदगी

जैसे चाहो, जी लो ज़िंदगी।

वापस लौटने की नहीं है गुंजाइश,
बस इतनी है शर्त-ए-ज़िंदगी।

रावण दहन

लोगों की ओर जल कर गिरते, बिखेरते आतिशो ने,

रावण से पूछा ये क्या कर डाला?

जवाब मिला –

तुम सब युगों-युगों से जला रहे है मुझे।

मैंने भी वही किया, तो बुरा क्यों मान गए?

सामने राम तो नज़र आए नहीं कहीं।

पर छुपे थे कईयों के अंदर अंश हमारे, कई रावण।

रात की दहलीज़ पर

दहलीज़ पर जलता दीया,

पाथेय बन राहें

उनके लिए रौशन है करता,

जिन्हें वापस आना हो।

ज़ो लौटें हीं ना

उनके लिए क्यों दीया जलाना

रात की दहलीज़ पर?