
खामोशी के सबक़



नज़रें झुका कर,
उठा कर,
पलकें झपका
कर अश्कों को क़ाबू
करना सीखा था, पर
आँखें ऐन वक्त पर
धोखा दे गईं।
जब आँखों को आँखें दिखाईं,
जवाब मिला
हमारी नहीं जज़्बातों
की ख़ता है।
आँखें ख़्वाब, औ सपने बुनतीं हैं,
हम सब बुनते रहते हैं,
ख़ुशियों भरी ज़िंदगी के अरमान।
हमारी तरह हीं बुनकर पंछी तिनके बुन आशियाना बना,
अपना शहर बसा लेता है.
बहती बयार और समय इन्हें बिखेर देते हैं,
यह बताने के लिये कि…
नश्वर है जीवन यह।
मुसाफिर की तरह चलो।
यहाँ सिर्फ रह जाते हैं शब्द अौर विचार।
वे कभी मृत नहीं होते।
जैसे एक बुनकर – कबीर के बुने जीवन के अनश्वर गूढ़ संदेश।

बुनकर पंछी- Weaver Bird.
इन आँसुओं से एक बात पूछनी है।
इतना नमक कहाँ से ढूँढ लाते हो?
कहाँ से बार बार चले आते हो?
रुक क्यों नहीं जाते ?
बातें क्यों नहीं सुनते ?
जब देखो आँखें धुँधली कर जाते हो।
ज़िंदगी, तुम्हारे सिखाए सबक़ सीखने के बाद
सूखे दरख़्तों की बयार, पतझड़ की छांव
ख़ाली पन्नों की बातें, मौन नम आँखें
और ख़ामोशी भरी ज़िंदगी भी अच्छी लगती है.

झुक कर रिश्ते निभाते-निभाते एक बात समझ आई,
कभी रुक कर सामनेवाले की नज़रें में देखना चाहिये।
उसकी सच्चाई भी परखनी चाहिये।
वरना दिल कभी माफ नहीं करेगा
आँखें बंद कर झुकने अौर भरोसा करने के लिये।



images from internet.
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