ज़िंदगी की किताब !!

ज़िंदगी के किताब को ना अपनी मर्ज़ी से बंद कर सकते हैं

ना आगे के सफ़ेद पन्नों को पढ़ सकते हैं।

सिर्फ़ आज़ के पन्नों से कभी कभी दिल भर जाता है!

और जाने- अनजाने अक्सर पुराने पन्ने पलट जातें हैं।

वहाँ होते हो तुम!

अज़ीज़ हो तुम,

पर नाराज़ है हम।

 बिना कहे तुम्हारे जाने से।

ज़िंदगी के रंग – 120

ज़िंदगी, तुम्हारे सिखाए सबक़ सीखने के बाद

सूखे दरख़्तों की बयार, पतझड़ की छांव

ख़ाली पन्नों की बातें, मौन नम आँखें

और ख़ामोशी भरी ज़िंदगी भी अच्छी लगती है.