ज़िंदगी की किताब !!

ज़िंदगी के किताब को ना अपनी मर्ज़ी से बंद कर सकते हैं

ना आगे के सफ़ेद पन्नों को पढ़ सकते हैं।

सिर्फ़ आज़ के पन्नों से कभी कभी दिल भर जाता है!

और जाने- अनजाने अक्सर पुराने पन्ने पलट जातें हैं।

वहाँ होते हो तुम!

अज़ीज़ हो तुम,

पर नाराज़ है हम।

 बिना कहे तुम्हारे जाने से।

 बंद किताबो के रिश्ते – कविता 

खुले आसमान के नीचे हम  इतनी बँद बँद जिंदगी  क्यों  जीते है ?

ठीक वैसे जैसे कुछ रिश्ते बंद किताबों में होते है. 

अपने आप से खुल कर बाते करो 

दिलो – दिमाग पर छाये तूफान को बस गुजर जाने दो….