उल्फ़त

चाँद हो आग़ोश में,

तो सितारों से उल्फ़त नहीं करते।

रौशन हो जहाँ आफ़ताब से,

तो जुगनुओं की रौशनी पर नहीं मरते।

Happy children’s Day India, 14 November

अपनी ज़िंदगी कब जियोगे?

लोग क्या कहेंगे?

अगर सुन रहे हो लोगों की।

तब जी रहे हो उनकी ज़िंदगी,

उनकी बातें,

उनकी ख्वाहिशें।

अपनी ज़िंदगी कब जियोगे?

नया सहर

अहम बातें

ज़िंदगी की कुछ अहम बातें है –

दिल औ दिमाग़ में ज्ञान भरने के लिए पढ़ना,

दिल औ दिमाग़ में भरे दर्द हटाने,

खाली करने के लिए लिखना।

बातों को समझने के लिए ज़िक्र औ चर्चा करना।

यादों से निकलने के लिए उनको समझना।

बातों को आत्मसात् करने के लिए पढ़ाना।

राज़-ए-दिल और दिल की बातें दिल में रखना।

राख़ में दबी चिंगारी

चोट किसी की ख़्वाहिशों के

अन्दाज़ से नहीं भरता।

भरता है, अपने तरीक़े से,

अपने समय से।

कुरेदने से राख़ में दबी चिंगारी

आग भड़काती है फ़िज़ाओं में ।

अपने चोट, घाव ना कुरेद,

दो समय भरने का।

Wounds don’t heal the way we

want them to, they heal the way

they need to. It takes time to heal.

Be gentle with your wounds.

ए’तिबार

हम थे ख़फ़ा ख़फ़ा उन से।

और बेरुख़ी से वो चल दिए,

वहाँ जहाँ हम मना ना सके।

वफ़ा-जफ़ा, वफ़ाई-बेवफ़ाई,

के ग़ज़ब हैं अफ़साने।

ग़ज़ब हैं फ़साने।

हमें ऐतबार हीं नहीं रहा ज़माने पर।

सागर मंथन

गहरे सागर मंथन से अमृत मिला और गरल।

अपने अंदर के रौशनी-अंधकार समझ ऊपर उठना है,

अपनी भावनाओं-विकारों को देखना-समझना है,

तब दिल-औ-दिमाग़ का सागर मंथन है सबसे सरल।

सफ़र ज़िंदगी की

अपेक्षायें, सफ़ाई और

कई जज़्बा-ए-बेनाम,

आने लगे सफ़र-ए-ज़िंदगी के बीच।

जो चैन और सुकून छीन ले,

तब

लोगों को ना करे कोशिश बदलें की।

आसपास के लोगों को बदल दें।

अर्थ- जज़्बा-ए-बेनाम: अनाम अहसास / nameless emotions.

तुम चाहते हो….

चाहत मेरी या चाहत तेरी,

है क्या रूबरू हक़ीक़त से?

कहते हैं मिल जाती है कायनात,

चाहो ग़र शिद्दत से।

पर कुछ हसरतें, रह जातीं हैं हसरतें।

ग़र तुम चाहते हो किसी को रूह से

तब बनी रहेगी यह

मद्धम सी लौ-ए-चाहत अनंत तक।

आसमाँ और ज़मीं, सूरज और चाँद की उल्फ़त सी।

कुछ चाहतों में मिलन नहीं,

होती हैं ये चाहतें, चाहते रहने के लिये।

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