दरवेश रक्स / नृत्य- कविता (whirling Darvesh/ sufi dance- Poem)


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जीवन एक नृत्य हैं.

शायद दरवेश रक्स की तरह ,

गोल गोल अपने  ही घेरे में

घूमते और झूमते.

चलती रहती हैं जिंदगी.

या दिये की लौ की तरह हैं.
ऊपर उठती खुशी से लपलपाती.

कभी जीवन के झँझावात जैसे

हवा  के झोंकों को झेलती.

कांपती , ठिठकती.

कभी लौ  के खुबसूरत रंग .

.पीले लाल सुनहरे रंग जैसी जिंदगी .

दीपायमान लौ या  दरवेश रक्स

क्या हैं ये  जिंदगी?

जिंदगी के रंग – कविता 10

कभी हमनें बिना सोंचे कुछ कह दिया।
उलझन में , कभी बिना बोले रह गये।

ना जाने इस  गलतफहमी में

कब कहाँ किसी का दिल दुखा दिया,

कब अपने दिल में छाले बना लिया………..

 

 

 

 

 

दुनिया के धोखे

बातें करते हैं लोग बङी-बङी,

बनते है शिक्षित और बौद्धिक,

दूसरों को कहतें हैं फरेबी अौर धोखेबाज।

कुछ ने बेबसी – गरीबी से धोखा दिया।

पर उनका क्या  जो सबल – सामर्थवान-धनवान हैं?

कहतें हैं पाना मुश्किल था,

इस लिये धोख का सरल राह पकङ ली?

सभी चीजें मुश्किल  है,

पाने के बाद  हीं वे आसान होती हैं

क्या बस   धोखे की दुनिया है?

दिवाली अौर मोमबत्ती कविता, Diwali N candle-spiritual poem


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अंधेरे में जल उठी छोटी सी  मोमबत्ती,

रोशन कर दिया जहाँ।

सारा अंधकार तिरोहित हो गया।

दिल में ख्याल आया -मोमबत्ती बन जाऊँ।

सभी को राह दिखाँऊ……….

खुशी अौर रौशनी बिखेरूँ ,

                      मोमबत्ती मेरी बात सुन हँस पङी अौर बोली –

क्या अपने दिल को जला  कर आसूँ बहा  सकोगी?

अपने को तपा अौर गला सकोगी?

पवन  के झूमते थपेङों से अपने को बचा सकोगी?

तभी दिवाली होगी।

तभी रौशन होगा यहाँ अौर सारा जहाँ।

image from internet.

रावण है, इसलिये राम याद आतें हैं (कविता) #RavanVadhh


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woman

सदियाँ अौर युग बीते,

रावण कभी नहीं मरा,

उसने अत्याचार किया, पर परस्त्री को स्पर्श नहीं।

आज के रावण तो नारी अस्मिता के भक्षक हैं।

नहीं लगाते दहेज पर विराम।

पर काली -दुर्गा कहलानेवाली के गर्भयात्रा को हीं रोक देतें हैं……….

क्यों नारी नापी जाती है मात्र रुप-रंग से,

क्यों नहीं योग्यता बौद्धिकता से?

क्यों नहीं यह माप-दंङ पुरुषों पर लागु है?

सुंदरता तो हमारे नयनों में होती है।

यह सब सौंदर्य बोध अौर नियम तो हमने बना लिया है………….

सदियाँ अौर युग बीते,

रावण कभी नहीं मरा,

रावण है, इसलिये राम याद आतें हैं।

images from internet, with thanks.

अभिमन्यु की तरह (कविता) poem of an unborn baby

Rekha Sahay's avatarThe REKHA SAHAY Corner!

baby

चक्रव्यु तोङने वाले ,

अभिमन्यु की तरह सुनती वहाँ,

बाहर की बातें  –

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ,

मुझे नहीं पता, मैं कौन हूं?  बेटा या बेटी ?

पर बङे  शुकून से मैं थी वहाँ,

सबसे सुरक्षित, महफूज।

तभी, एक  दिन किसी ने प्रश्न किया  –

          बेटा  है या बेटी ?

आवाज  आई – बेटी !!

धीमा सा  उत्तर आया – नहीं चाहिये, गिरा दो । 

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आज़ाद परिंदे (कविता )

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बनाने वाले ने सब को

आज़ाद बनाया.

बाँध लिया हमने अपने को

रिश्ते नाते,  अपने-पराये, धर्म देश  की  सीमा …..

जैसे  बंधनों  में.

हमसे तो अच्छे

ये आज़ाद परिंदे हैं.

कन्या पूजन ( कविता )


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नवरात्रि की अष्टमी तिथि ,
प्रौढ़ होते, धनवान दम्पति ,
अपनी दरिद्र काम वालियों
की पुत्रियों के चरण
अपने कर कमलों से
प्यार से प्रक्षालन कर रहे थे.

अचरज से कोई पूछ बैठा ,
यह क्या कर रहें हैं आप दोनों ?

अश्रुपूर्ण नत नयनों से कहा –
“काश, हमारी भी प्यारी संतान होती.”
सब कुछ है हमारे पास ,
बस एक यही कमी है ,

एक ठंडी आह के साथ कहा –
प्रायश्चित कर रहें है ,
आती हुई लक्ष्मी को
गर्भ से ही वापस लौटाने का.

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Source: कन्या पूजन ( कविता )

तो लोग क्या कहेगें? (कविता)

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पूरे आस-विश्वास के साथ वह लौटी पितृ घर,

पिता की प्यारी-लाङली

पर ससुराल की व्यथा-कथा सुन,

सब ने कहा- वापस वहीं लौट जा।

किसी से कुछ ना बता,

वर्ना लोग क्या कहेगें ?

इतने बङे लोगों के घर की बातें बाहर जायेगी, तो लोग क्या कहेगें?

( लोग सोचतें हैं, घर की बेटियों को परेशानी में पारिवारिक सहायता मिल जाती है। पर पर्दे के पीछे झाकें बिना सच्चाई जानना मुशकिल है। कुछ बङे घरों में एेसे भी ऑनर किलिंग होता है)

Source: तो लोग क्या कहेगें? (कविता)

हाल – कविता( आध्यात्मिक सूफी संगीत में डूबा नृत्य )


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हाल में डूबे हो तो हाला का हलाहल भी असर नहीँ करता। बस, सारे आकाश में, ईश की आभा बिखरी दिखती है।   photo taken from internet.…

Source: हाल – कविता( आध्यात्मिक सूफी संगीत में डूबा नृत्य )