दिवाली अौर मोमबत्ती कविता, Diwali N candle-spiritual poem


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अंधेरे में जल उठी छोटी सी  मोमबत्ती,

रोशन कर दिया जहाँ।

सारा अंधकार तिरोहित हो गया।

दिल में ख्याल आया -मोमबत्ती बन जाऊँ।

सभी को राह दिखाँऊ……….

खुशी अौर रौशनी बिखेरूँ ,

                      मोमबत्ती मेरी बात सुन हँस पङी अौर बोली –

क्या अपने दिल को जला  कर आसूँ बहा  सकोगी?

अपने को तपा अौर गला सकोगी?

पवन  के झूमते थपेङों से अपने को बचा सकोगी?

तभी दिवाली होगी।

तभी रौशन होगा यहाँ अौर सारा जहाँ।

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रावण है, इसलिये राम याद आतें हैं (कविता) #RavanVadhh


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सदियाँ अौर युग बीते,

रावण कभी नहीं मरा,

उसने अत्याचार किया, पर परस्त्री को स्पर्श नहीं।

आज के रावण तो नारी अस्मिता के भक्षक हैं।

नहीं लगाते दहेज पर विराम।

पर काली -दुर्गा कहलानेवाली के गर्भयात्रा को हीं रोक देतें हैं……….

क्यों नारी नापी जाती है मात्र रुप-रंग से,

क्यों नहीं योग्यता बौद्धिकता से?

क्यों नहीं यह माप-दंङ पुरुषों पर लागु है?

सुंदरता तो हमारे नयनों में होती है।

यह सब सौंदर्य बोध अौर नियम तो हमने बना लिया है………….

सदियाँ अौर युग बीते,

रावण कभी नहीं मरा,

रावण है, इसलिये राम याद आतें हैं।

images from internet, with thanks.

अभिमन्यु की तरह (कविता) poem of an unborn baby

Rekha Sahay's avatarThe REKHA SAHAY Corner!

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चक्रव्यु तोङने वाले ,

अभिमन्यु की तरह सुनती वहाँ,

बाहर की बातें  –

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ,

मुझे नहीं पता, मैं कौन हूं?  बेटा या बेटी ?

पर बङे  शुकून से मैं थी वहाँ,

सबसे सुरक्षित, महफूज।

तभी, एक  दिन किसी ने प्रश्न किया  –

          बेटा  है या बेटी ?

आवाज  आई – बेटी !!

धीमा सा  उत्तर आया – नहीं चाहिये, गिरा दो । 

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आज़ाद परिंदे (कविता )

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बनाने वाले ने सब को

आज़ाद बनाया.

बाँध लिया हमने अपने को

रिश्ते नाते,  अपने-पराये, धर्म देश  की  सीमा …..

जैसे  बंधनों  में.

हमसे तो अच्छे

ये आज़ाद परिंदे हैं.

कन्या पूजन ( कविता )


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नवरात्रि की अष्टमी तिथि ,
प्रौढ़ होते, धनवान दम्पति ,
अपनी दरिद्र काम वालियों
की पुत्रियों के चरण
अपने कर कमलों से
प्यार से प्रक्षालन कर रहे थे.

अचरज से कोई पूछ बैठा ,
यह क्या कर रहें हैं आप दोनों ?

अश्रुपूर्ण नत नयनों से कहा –
“काश, हमारी भी प्यारी संतान होती.”
सब कुछ है हमारे पास ,
बस एक यही कमी है ,

एक ठंडी आह के साथ कहा –
प्रायश्चित कर रहें है ,
आती हुई लक्ष्मी को
गर्भ से ही वापस लौटाने का.

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Source: कन्या पूजन ( कविता )

तो लोग क्या कहेगें? (कविता)

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पूरे आस-विश्वास के साथ वह लौटी पितृ घर,

पिता की प्यारी-लाङली

पर ससुराल की व्यथा-कथा सुन,

सब ने कहा- वापस वहीं लौट जा।

किसी से कुछ ना बता,

वर्ना लोग क्या कहेगें ?

इतने बङे लोगों के घर की बातें बाहर जायेगी, तो लोग क्या कहेगें?

( लोग सोचतें हैं, घर की बेटियों को परेशानी में पारिवारिक सहायता मिल जाती है। पर पर्दे के पीछे झाकें बिना सच्चाई जानना मुशकिल है। कुछ बङे घरों में एेसे भी ऑनर किलिंग होता है)

Source: तो लोग क्या कहेगें? (कविता)

हाल – कविता( आध्यात्मिक सूफी संगीत में डूबा नृत्य )


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हाल में डूबे हो तो हाला का हलाहल भी असर नहीँ करता। बस, सारे आकाश में, ईश की आभा बिखरी दिखती है।   photo taken from internet.…

Source: हाल – कविता( आध्यात्मिक सूफी संगीत में डूबा नृत्य )

जान की कीमत – कविता #poemonwar


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Political borders have divided the world.  Have they also divided our hearts? War fills us  with grief and pain and costs life of hundreds. Isn’t there a better way to solve disputes?

 

शहादतें थमती क्यों नहीं है?

लोग वहाँ भी मरते हैं , यहाँ भी मरते हैं।

घर – परिवार  उजङते हैं।

कल तक वो अपने थे।

आज दुश्मन हैं।

 विदेशी  शासकों की खींची सीमा रेखा

अौर कुछ देशी राजनीतिक नारों ने ,

गर, कत्लेआम करा दिया था.

हमनें समझा क्यों नहीं?

कितने भोले हैं हम ?

                      हमारे चैन की नींद के लिये,  सीमा पर कितने  चैन की

नींद सो जाते हैं?

क्या   युद्ध में  झलक नहीं है,

जंगल जीवों जैसा?

क्या किसी के पास है  इसका  उपाय ?

लोग युद्ध लङने की बातें करते हैं।

                  नहीं जानते क्या,युद्ध की विभिषिका ?

                          बारुद की ढेर पर बैठे हैं हम सब।

                                              जान की कीमत इतनी कम क्यों है?

 

 

भव्य साङी- कविता saree – poem #indianTraditionalWear


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#sareefestival #Shailysahayreadingitatsareefestival

 Sari  is  considered to be of  spiritual benefits in compression to Stitched fabrics . Saree is a traditional Indian wear. It is an unstitched length of cloth measuring 42 – 49″ wide and 5.5 to 9 yards in length.

९ गज का वस्त्र ,साङी पारंपारिक अौर सात्त्विक परिधान माना जाता है । गांठ से  बांधनेवाले, बिनसिले वस्त्र के ४-५ मीटर लंबे टुकडे, जो कमर पर लपेटे कर कटि में गांठ द्वारा बांधे जाते हैं, सिले हुए वस्त्रों की तुलना में आध्यात्मिक लाभ वाले माने जाते हैं।

sari

क्या होता है कहीं ऐसा परिधान ?
खुबसूरत भव्य साङी, मात्र एक लम्बा चीर
नारी के सौंदर्य को बढाता भी है
अौर छुपाता भी है।
ममता भरे आचंल की छावँ,
घुँघट अौर पल्लु की नव गजी ,
भारतीय नारी की पारंपरिक साडी।

इसे बनाने, बुनने अौर पहनने के अनगिनत तरिके।
कभी ना कभी हर वामा हर नारी,
दिल से, पहनती है साङी।
कहनेवाले कहते हैं –
विदेशी वस्र हैं, महिला अपमान का कारण,
पर चीर हरण तब भी होता था,
अब भी होता है।
समस्या वस्र नहीं, मानसिकता में है।

आध्यात्मिक कहलाने वाले धोती-साङी , थी परंपरा पहचान,
पुरुष भूल रहें हैं
पर, कैसे पहने साङी इसमें आज भी उलझी नारी।

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विश्वास- कविता faith- poem


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जिंदगी निकल गई खुश रहने की कोशिश अौर,

लोगों को खुश करने की कोशिश में।

दूसरों को खुबसूरती दिखाने अौर,

खुबसूरत दिखने की कोशिश में।

अब समझा आया, खुबसूरती अपने अंदर होती है।

अपने को पसंद करो अौर स्वंय खुश   रखो।

जीवन  की बदलती करवटें

सोंच पैदा करतीं हैं।

फिर लगता है ,

शायद ये, जिंदगी सीधी कर रहीं हैं।

बस विश्वास का ङोर थामे रखो।