
आख़िर क्या वजह थी









ज़िंदगी में जो इश्क़ तुमने सिखाये।
जीने के जो आदाब तुमने सिखाये।
ज़माने में यूँ अकेला छोड़,
जीवन के अधूरे सफ़र में साथ छोड़,
वस्ल-ओ-हिज्र के जो तरीक़े सिखाये।
इस हिज्र ने गुरु बन ऊपरवाले से मिलाये।
वस्ल-ए-इश्क़ गुरु बन मुझे मेरा पता बताए।
अर्थ –
* वस्ल-ओ-हिज्र – मिलन और वियोग, प्रेमी
और प्रेमिका का आपस में मिलना और बिछुड़ना।
* हिज्र – अकेलापन, जुदाई, विरह, वियोग,
विछोह, त्याग।

अपना पीछा करते करते,
मुलाक़ात हुई अपनी परछाईं-ए-नक़्श से।
मिले दरिया के बहते पानी में अपने अक्स से।
मिले आईने में जाने पहचाने अजनबी शख़्स से।
मुस्कुरा कर कहा आईने ने –
बड़ी मुद्दतों के बाद मिली हो अपने आप से।
वक्त तो लगेगा जानने में, पहचानने में।
उलझे जीवन रक़्स में,
बिंब-प्रतिबिंब देख बे-‘अक्स
हो खो ना जाए यह शख़्स।
अर्थ – रक़्स – नृत्य

कमल की अधखिली कलियाँ हों नीम-बाज़।
या नींद में डूबी आँखें नर्गिस-ए-नीम-बाज।
ख़ूबसूरती और ख़ुशबू से दोनों की कर देतीं है
दिल ख़ुश मिज़ाज।
अर्थ
*नर्गिस-ए-नीम-बाज -half opened eye (like narcissus flower)
* नीम–बाज़ – अध-खुला, आधा खुला आधा बंद, अधखुली,नशीली, मदहोश, मंत्रमुग्ध (प्रायः पलक, पुत्ली, आँख, कली आदि की विशेषता के लिए प्रयोग )
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