इतना तो मेरा हक़ बनता था!

मालूम है कि ज़िंदगी है एक रंगमंच

और हम सब किरदार।

पर कौन है शेष रह गए कई अनुत्तरित

सवालों के जवाब का ज़िम्मेदार ?

सब जाएँगें ख़ाली कर बस्ती एक दिन।

पर ऐसे बिन बताए जाता है कौन?

बरहम….. आक्रोश, नाराज़गी जाती नहीं।

ज़वाब मिले, इतना तो मेरा हक़ बनता था।

दोस्ती

बोतल से प्यार कर

महफ़ूज़ रहती है सूरा।

शराबी से आशिक़ी कर,

लगे नशेमन का कलंक।

हिना डाल पर हरी,

पाषाण की दोस्ती से बदल जाए रंग।

कमल का प्यार पानी संग

खिल जाए उसका रूप रंग।

लोहा का प्यार पानी से।

टूटे खा कर जंग।

कुछ लगाव अज़ीम रिश्ते हैं बनाते।

कुछ दोस्ती लगाते है कलंक।