ठहराव

तकरार औ इकरार हो,

शिकवे और गिले भी।

पर ठहराव हो, अपनापन,

भरोसा और सम्मान हो,

ग़र निभाने हैं रिश्ते।

वरना पता भी नहीं चलता।

आहिस्ता-आहिस्ता,

बिन आवाज़

बिखर जातें हैं रिश्ते,

टूटे …. शिकस्ते आईनों

की किर्चियों से।

9 thoughts on “ठहराव

  1. On Mon, Jan 10, 2022 at 8:17 AM The REKHA SAHAY Corner! wrote:

    > Rekha Sahay posted: ” तकरार औ इकरार हो, शिकवे और गिले भी। पर ठहराव हो, > अपनापन, भरोसा और सम्मान हो, ग़र निभाने हैं रिश्ते। वरना पता भी नहीं चलता। > आहिस्ता-आहिस्ता, बिन आवाज़ बिखर जातें हैं रिश्ते, टूटे …. शिकस्ते आईनों की > किर्चियों से।” >

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  2. के खिलाफ
    वो आत्मा
    उनकी विविधता में
    झगड़ा मत करो

    वो आत्मा
    चेतना में मन
    हर इंसान में है

    वो आत्मा
    हकीकत है
    जीवन की

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  3. बहुत अच्छी और सही बात कही रेखा जी आपने। मृदुला अरूण जी की एक ग़ज़ल का पहला शेर याद दिला दिया आपने :
    आँच देंगे सर्द मौसम में दुशालों की तरह
    टूटने मत दीजिए सम्बन्ध प्यालों की तरह

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    1. बहुत सुंदर ग़ज़ल ! धन्यवाद जितेंद्र जी।
      आजकल कम हीं लोगों को सम्बन्धों में गरमाहट बरकरार रखने की कोशिश करते देखतीं हूँ। एक तरफ़ा कोशिश कितने दिनों काम आती है?

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