काँच की नगरी

टूट कर मुहब्बत करो

या मुहब्बत करके टूटो.

यादों और ख़्वाबों के बीच तकरार चलता रहेगा.

रात और दिन का क़रार बिखरता रहेगा.

कभी आँसू कभी मुस्कुराहट का बाज़ार सजता रहेगा.

यह शीशे… काँच की नगरी है.

टूटना – बिखरना, चुभना तो लगा हीं रहेगा.

7 thoughts on “काँच की नगरी

  1. बड़ी बड़ी सारगर्भित बात कही है रेखा जी आपने । जगजीत सिंह जी की गाई हुई एक बहुत अच्छी ग़ज़ल याद आ गई मुझे :

    या तो मिट जाइए या मिटा दीजिए
    कीजिए जब भी सौदा, खरा कीजिए

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    1. ग़ज़ल की उम्दा पंक्तियों के लिए बहुत आभार जितेंद्र जी. जीवन कुछ ऐसा हीं होता है.

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    1. टूटना, बिखेरना तो सबक़ है. फिर उन सब से मज़बूत हो कर निकलना हीं ज़िंदगी है.

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