शब्दों और  विचारों की खोज (लेखकों के  लिये प्रेरक )Searching words n ideas (Motivational though for writers) 

It is perfectly  normal for writers to fall short of words and ideas sometimes. In my experience reading is the best solution to develop a treasure of words and ideas. So  just keep reading and of course keep smiling.and yes keep writing too!

कुछ समय पहले मैंने अपने एक ब्लॉगर मित्र को दुविधाग्रस्त पाया. विचारों और शब्दों के जाल में उलझा पाया. मेरा ख्याल हैं , हम सब कभी ना कभी ऐस समय से गुजरते हैं. ऐसे में अध्ययन करना या पढ़ना मदद कर सकता हैं. इस से हमारे पास अपने आप शब्दों  और विचारों का भंडार बन जाता हैं. बस फिर इनसे हम अपनी दुनिया बना सकते हैं. लोगों को हँसा और रुला सकते हैं. पढ़ने के लिये हमारे पास ब्लॉग और पुस्तकों की अनमोल दुनिया हैं.

 

अपनी जङें मजबूत करें – बांस की तरह (प्रेरक लेख / motivational thought )

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बांस एक तरह का घास है। चीनी बांस के पेड़  छह सप्ताह में  80 फुट लम्बे हो जाते है। यह बङी हैरानी की बात है। पर सच्चाई यह है कि इसे लगाने के चार वर्ष  बाद तक  इस में  विकास के कोई चिन्ह नहीं दिखते।  पर इसे  पानी अौर पोषण उपलब्ध कराया जाता है।  चार वर्ष के बाद   पांचवें वर्ष में  एक चमत्कार की तरह  बांस के पेड़ सिर्फ छह सप्ताह में 80 फुट बढ़ जाते हैं।

यह चमत्कार नहीं है। इतने समय यह निष्क्रिय नहीं रहता।  चार वर्षौं के दौरान बांस  अपने अस्सी फुट ऊँचाई को संभालने के लिये अपनी जङों को बनाता अौर मजबूत करता रहता है।  वर्ना यह अचानक  अपनी 80 फुट लम्बी काया को संभाल नहीं सकेगा।

हम भी थोङे मेहनत के बाद हीं सफलता की कामना करने लगते हैं। जब कि जड़ें मजबूत बनने के लिये  धैर्य  अौर परिश्रम की जरुरत होती है। प्रतिकूल परिस्थितियों और चुनौती का सामना करने की शक्ति अौर सफलता  संभालने के लिए मजबूत नींव बनने में समय लगता है। इस लिये असफलता से ङरने के बदले इसे जङों या आधार अौर नींव का निर्माण काल मानना चाहिये। जब एक घास में इतना सामर्थ है तब हम तो ईश्वार की सर्वौत्तम रचना हैं।

 

I am waiting for your valuable comments and feedbacks. I love  them.

 

 

 

 

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आँखें  ( कहानी )

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मौसम सुहाना था. वर्षा की बूँदें टपटप बरस रहीं थीं. दोनों मित्रों  की आँखे भी बरस रहीं थी.  दोनों मित्र एक दूसरे के समधी भी थे. इन्द्र ने अपने इकलौते बेटे की शादी अपने मित्र चंद्र की एक मात्र पुत्री से कर दिया था. 

दोनों दोस्त बिजनेस  में आधे – आधे पार्टनर थे. वर्षों पुरानी दोस्ती सम्बन्ध में बदल जाने से अब पार्टनरशिप के हिसाब  सरल हो गये थे. दोनों मित्र जाम टकराते हुये हिसाब की बात पर अक्सर कह बैठते -“छोडो यार ! अगर हिसाब कुछ ऊपर नीचे हो भी गया तब क्या फर्क पड़ता हैं ? अगर  घी  गिरेगा भी तो दाल में ही ना ? 

दो दिनों से इन्द्र का बेटा घर वापस नहीँ आया था. खाने -पीने का शौकीन बेटा  पहले भी ऐसा करता था. पर इस बार उसका फोन भी बंद  था. परेशान हो कर , दोनों ने उसकी खोज ख़बर लेनी  शुरू की. पुलिस स्टेशन , अस्पताल सब जगह दोनों दौड़ लगा रहे थे.
 पुलिस से मिली ख़बर सुन  वे गिरते पड़ते  लखनऊ के पास के बर्ड सेंचुरी के करीब पहुँचे.  कार सड़क के दूसरी ओर रुकवा  कर   दोनों उतरे. मन ही मन अपने अराध्य  देव से मना रहे थे, यह ख़बर झूठी निकले. सड़क पार कर पहुँचे.

इन्द्र के  जवान पुत्र का शव  सड़क के किनारे पडा  था. तभी पीछे से आई चीख सुन दोनों  पलटे. चीख  चंद्र की   पूर्ण गर्भवती पुत्री की थी. वे भूल ही गये थे. वह  कार में बैठी थी. बहुत रोकने  करने पर भी वह साथ आ गई थी. पति के शव को तो नहीँ , पर उसके चिकेन के कुर्ते के रंग को  वह दूर से ही पहचान गई. अपने हाथों से  इस्त्री कर सोने के बटन लगा कर पति को पहनने के लिये  दिया था.वह बदहवास    सड़क पर दौड़ पड़ी और सामने से आती ट्रक से टकरा गई.

दोनों मित्रों की नज़रें एक दूसरे से मिली. दोनों मनो  जड़ हो गये. उनकी कार का ड्राइवर रामधनी दौड़ता हुआ आ कर चीख पड़ा तब जैसे दोनों की तंद्रा टूटी. उनकी आँखों के सामने वर्षों पुरानी यादें नाचने लगी.

****

 दोनों मित्र   रांची  मेन रोड स्थित हनुमान मंदिर से  पूजा करके निकले. मॆन रोड की भीड़ देख दोनो चिंतित हो गये.  उन्हें जल्दी स्टेशन पहुँचना था. दोनों में दाँत काटी दोस्ती थी. जो भी करते साथ साथ करते. हनुमान जी की भक्ति हो या कुछ  और. उनकी परेशानी  बस एक थी. उन दोनों के इष्ट ब्रह्मचारी थे और वे दोनों नारी सौंदर्य के अनन्य उपासक. वरना वे लंगोट भी लाल ही बाँधते थे, ठीक हनुमान जी की तरह  और सही अर्थों में लंगोटिया यार थे.

जब वे स्टेशन पहुँचे, सामने राजधानी ट्रेन खड़ी थी. दौड़ते भागते दोनों ट्रेन मॆं पहुँचे. चेहरे पर किसी रेस में ट्राफी मिलने जैसी विजय मुस्कान छा गई. चलो , हनुमान जी की कृपा से ट्रेन तो मिल गई.

सफ़र मजे में कट रही थी. दोनों  ताश की गड्डी और शीतल पेय की बोतलें निकाल अपनी सीटों पर जम गये. बोतल के अंदर पेय परिवर्तन का ट्रिक दोनों ने ईजाद कर लिया था.

तभी दोनों की नज़रें पास के बर्थ पर अकेली यात्रा कर रही रूपवती  और स्वस्थ युवती पर पड़ी. दोनों मित्रों एक दूसरे को आँखों ही आँखों मे देख मुस्कुराये और आपस में उस पर कुछ भद्दे जुमले कसे. 

तभी वह युवती इनके पास से गुजरी. उसके जिस मोटापे पर दोनों ने  व्यंग लिय था. वह स्वभाविक नहीँ था. दरअसल वह गर्भवती थी. किसी से फोन पर कह रही थी – “हाँ , खुश खबरी हैं. बडी  पूजा और मन्नतों के बाद यह शुभ समय आया हैं. सोचती हूँ , इस बड़े मंगल के दिन सेतु हनुमान मंदिर में चोला  चढा दूँ. उन्हें ही चिठ्ठी और अर्जी भेजी थी. उन्होंने मेरी प्रार्थना सुन ली. ” 

दोनों ने नशे में झूमते हुये कहा -” यह तो टू इन वन हैं .” और  ठहाका लगाया. जल्दी ही दोनों की नशे भरी आँखें बंद होने लगी. वे  अपने अपने बर्थ पर लुढ़क गये.

सुबह अँधेरे  में ही ट्रेन कानपुर स्टेशन पहुँच गई. स्टेशन से बाहर उनकी लम्बी काली कार खड़ी थी. ड्राईवर रामधनी ने आगे बढ़ कर उनके बैग ले लिये. कार लखनऊ की ओर दौड़ पड़ी. रिमझिम वर्ष होने लगी थी. पूर्व में आकाश में लाली छाने लगी थी. वैसी ही लाली  मित्र द्वय की आँखों में भी थी. नशा अभी उतरा नहीँ  था. आँखों में नशे की खुमारी थी.

  इन्द्र ने   रामधनी से कार किसी चाये के दुकान पर रोकने कही। दोनों  कार की पिछली सीट पर सोने की कोशिश करने लगे. रामधनी ने हँस कर पूछा – “लगता हैं रात में आप लोगों की खूब चली हैं ”  रामधनी ड्राइवर कम और उनके काले कारनामों का साथी और राजदार ज्यादा था. 
दोनों सिर हिला कर ठठा कर हँस पड़े और निशाचर इन्द्र ने जवाब दिया – “अरे यार ! इतने सवेरे का सूरज तो मैंने आज़ तक नहीँ देखा हैं. 10-11 बजे से पहले तो मेरी नींद ही नहीँ खुलती हैं. “

चंद्र ने आँखें  खोले बगैर ट्रेन को इतनी सबेरे पहुँचने के लिये  एक भद्दी  गाली देते हुये कहाँ – यार बड़ी रूखी यात्रा थी  और अब यह सुबह -सुबह  चाय की खोज क्यों कर रहे हो? उसने अपने बैग से एक बोतल निकाल कर मुँह से लगा लिया. नशा कम होने के बदले और बढ़ गया.

एक ढाबे के सामने कार रुकी. अभी भी अँधेरा पूरी  तरह छटा नहीँ था. बारिश तेज हो गई थी. ठीक आगे की टैक्सी से ट्रेन वाली युवती  उतर रही थी. दोनों मित्रों की आँखें धूर्तता से चमकने लगी. रामधनी  और उनमें कुछ  बातें हुई. रामधनी ने चारो ओर नज़रें घुमाई. चारो ओर सन्नाटा छाया था.

रामधनी ने कार महिला के बिलकुल पास रोका. जब तक गर्भभार से धीमी चलती  वह महिला कुछ समझ पाती. पीछे की गेट खोल दोनों ने उसे अंदर खींच लिया. कार के काले शीशे बंद हो गये. कार  तेज़ी से सड़क पर दौड़ने लगी.

 हाथ -पैर मारती महिला  चीख रहीं थी. वह गिडगिडाते हुये बोल उठी – “मैं माँ बनने वाली हूँ. मुझे छोड़ दो. भगवन से डरो.”
रामधनी ने हड़बड़ा कर कहा -“साहब बड़ी भूल हो गई. यह तो पेट से हैं…यह माँ बननेवाली हैं. यह बड़ा भरी अन्याय होगा.” और उसने कार खचाक से रोक दी. कार एक झटके से रुक गई. जब तक किसी की समझ में बात आती. वह युवती कार का द्वार खोल बाहर निकल गई और सड़क के दूसरी ओर से आते वाहन से टकरा कर गिर पड़ी.वाहन बड़ी तेज़ी से आगे बढ़ गया. सुनसान सड़क पर युवती की दर्दनाक चीत्कार गूँज उठी.. ।पास के पेङो से  पक्षी भी शोर मचाते  उङ गये।

तीनो भागते हुये उसके करीब पहुँचे. उसकी आँखें बंद हो रहीं थी. आँखों के कोरों से आँसू  बह रहे थे. शरीर दर्द से ऐंठ रहा था. उसने  अधखुली आँखों से उन्हे देखा. लड़खडाती और दर्द भरी आवाज़ में उसने कहा – ” तुम्हा…  तुम्हारा वंश कभी नहीँ बढेगा.  –  तुम्हारा वंश कभी नहीँ बढेगा.” रक्तिम होती सड़क पर उसने आखरी साँसें ली. और उसकी अध खुली आँखें ऐसे पथरा गई. जैसे वे आँखे उन्हें  ही देख रहीं हों.

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रामधनी पागलों की तरह बडबडाने लगा -” भाई जी,  उस  ने  बद्दुआ दी हैं. यह तो पूरी हो कर रहेगी. माँ बनने वाली थी. उसकी बात खाली नहीँ जायेगी. आपने देखा, उसकी आँखों में ? प्रायश्चित करना ही होगा. प्रायश्चित…” 

दोनों मित्र घबड़ा गये. उनका नशा उतर गया था. अपने को सम्भल कर वे झट कार के पास लौटे. चारो ओर फैला सन्नाटा देख चैन की साँस ली, चलो  किसी ने  देखा तो नहीँ.  शायद अपने सर्वज्ञ इष्टदेव का उन्हे स्मरण नहीँ आया.

ललाट पर आये पसीने और बरसात की बूँदें घुल मिल गये थे. इन्द्र ने तुरंत निर्णय लिया और बौखलाये रामधनी को पीछे की  सीट  पर ठेल कर बैठा स्वयं चालक की सीट पर बैठ गया. चंद्र उसके बगल की सीट पर बैठ गया.

लखनऊ पहुँचने तक कार में मौन छाया रहा. हजरतगंज चौराहे की  लाल बत्ती पर कार रुकी. तभी अचानक रामधनी कार से उतर कर हनुमान मंदिर की ओर दौड़ गया. दोनों मित्र भी कार किनारे रोक उसके पीछे पीछे मंदिर पहुँचे.

उन्होंने देखा रामधनी मंदिर के फर्श पर साष्टांग लोट रहा हैं. और हनुमान जी के चरणों में ललाट टिकाये कुछ  बुदबुदा रहा हैं. पुजारी हैरानी से उसे देख रहे हैं.

चंद्र ने लपक कर उसे उठाया और तेज़ी से कार की ओर बढ़ गया. इन्द्र  पुजारी से माफी माँगने के अंदाज़ में बोल पड़ा -“पत्नी की बीमारी से बड़ा परेशान हैं , बेचारा.” रामधनी को रास्ते भर मुँह ना खोलने का निर्देश दोनों देते रहे , और वह लगातार प्रायश्चित्त की बात करता रहा.

कभी कभी दोनों उस घटना को याद करते. तब लगता जैसे उसकी पथराई अधखुली आँखें उन्हें घूर रहीं हैं. पर जल्दी ही दोनों ने इन बातों को बिसार दिया. हँसते खेलते परिवार और बच्चों के साथ जिंदगी अच्छी कटने लगी.

****

आज़ , इतने वर्षों बाद उसी जगह पर अपनी संतान के रक्त से रक्तीम हो रहीं लाल  सड़क पर लगा जैसे एक कमजोर पड़ती  दर्द भरी आवाज़ उनके कानों मे गूँजने लगी 

 –  तुम्हारा वंश कभी नहीँ  बढेगा……

 

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मॉकटेल- पिना कोलाडा (food and drink/ beverages)

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मॉकटेल पिना कोलाडा प्यूर्टो रिको का राष्ट्रीय पेय । यह  लोकप्रिय अौर स्वास्थवर्धक होता है। यह अनानास, नारियल का दूध , चीनी और आइस क्यूब्स से बनता है।
सामग्री-
2 कप कटा हुआ अनानास
4 से 6 आइस क्यूब्स
¾ कप नारियल पानी / नारियल का दुध 200 मिलीलीटर
2 -3 बड़े चम्मच चीनी या आवश्यकतानुसार  
गार्निश के लिए कटा हुआ अनानास
बनाने की विधि-
 कटे हुआ अनानास  से ब्लेंडर  या जूसर से जूस निकाल लें। जिस ग्लास में सर्व करना है । उसे  कुछ समय पहले फ्रिज में ठंडा होने रख दें। ग्लास में अनानास जूस, नारियल पानी / दूध, आइस क्यूब्स अौर चीनी डालें। इसमें आप नारियल क्रीम भी डाल सकते हैं।  
6 आइस क्यूब्स डालें।  अनानास  से गार्निश करें अौर तुरन्त सर्व करें ।

• ताजा जूस व नारियल दूध ना होने पर पैक का उपयोग कर सकते हैं।  
•  पिना कोलाडा मॉकटेल है अतः इसमें रम नहीं ड़ाला जाता है।

 

 

 

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Picture Courtesy: Chandni Sahay

अनमोल पल (कविता)

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मुट्ठी में पकडे रेत की तरह ,

ना जाने कब वक्त फिसल गया.

जिंदगी की आपाधापी में.

वर्षों बीत गये जैसे पल भर में.

 पुराने दोस्तों से अचानक 

भेट हो जाती हैं.

तब याद आता हैं ,

दशकों बीत गये , बिना आहट  के.

तब याद आते हैं 

वे सुनहरे – रुपहले दिन.

वे यादें , आज़ भी अनमोल हैं ,

वे साथी आज़ भी अनमोल हैं.

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Psychology #understandyourbehavior /मनोविज्ञान #अपने व्यवहार को समझने का विज्ञान

 

 

मनोविज्ञान – क्या यह मन का विज्ञान है?  इसके नाम से लगता हे, जैसे यह मन का विज्ञान है।  यह अनुभव अौर व्यवहार का विज्ञान है। यह एक एेसा विषय है जो हमारे व्यवहार को समझने में मदद करता है। यह हमारी मानसिक प्रक्रियाओं, अनुभवों अौर  व्यवहार का अध्ययन करता है। हम कब, क्या , क्यों, अौर कैसे य्यवहार करते हैं। इसे समझने का  विज्ञान है।

आज के समय में मनोविज्ञान बङा महत्वपुर्ण  हो गया है। यह  विज्ञापन, व्यावसाय, लोगों के  प्रतिक्रियाओं, जनमत या बाजार का रुझान,  खेल अौर खिलाङियों , अपराध का व्यवहार सब कुछ समझने के काम आता है।

क्यों नहीं अपने व्यवहार को समझा जाये?– विचार, चिन्तन, भाव ,आसपास के वातावरण अौर घटनाअों का असर हम पर पङता है। हमारा व्यक्तित्व , बौद्भिकता, संवेदन, सीखना, स्मृति, चिन्तन  हमारे व्यवहार पर असर ङालतें हैं। दरअसल,  हमारे व्यवहार एवं मानसिक प्रक्रियाएं आपस में जुटे होते  हैं। अतः अपने  व्यक्तित्व  को समझना जरुरी है।  ताकि अपने व्यवहार को समझा जा सके।

 

 

 

 

धुआँ (कविता)

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नज़रों के सामने धुन्ध सा
छाया था.
सब कुछ धुआँ धुआँ सा था.
तभी हवा चली , धुंध छ्टी
और देखा , ये तो परछाइयां हैं ,
जिन्हे हम इंसान समझ बैठे.

 

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शादी

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रोज़ के झिकझिक से परेशान ,
झूठी बातों  और धोखे से हैरान
जब भी उसने चाहा निकलना
सबने कहा -सात जन्मों का
बंधन हैं.
तुम्हे निभाना हैं.
पावन सम्बन्ध हैं
तुम्हे निभाना हैं.
पर यह तो सचमुच ऐसा बंधन हैं.
जो सिर्फ उसे निँभाना हैं.
ऐसा क्यों ?
काश ये बातें दोनों को कही जाती.

 

 

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