बर्न-आउट (एक मनोवैज्ञानिक समस्या)Burn out

Burnout is a state of emotional, mental, and physical exhaustion caused by excessive and prolonged stress. It occurs when you feel overwhelmed, emotionally drained, and unable to meet constant demands.

बर्न-आउट क्या है ?

ज़िंदगी की भागम-भाग, तनाव, काम की अधिकता अक्सर हमे शारीरिक और मानसिक रूप से थका देती है। जब यह थकान और परेशानी काफी ऊंचे स्तर तक चला जाता है तब ऐसा लगने लगता है जैसे जिंदगी की सामान्य समस्याओ को भी सुलझाना कठिन हो गया है। बर्न-आउट मानसिक या शारीरिक कारणो से हो सकता है। यह लंबे दवाब तथा थकान का परिणाम होता है।बर्न-आउट कार्य-संबंधी या व्यक्तिगत या दोनों कारणो से हो सकता है। ऐसे में मानसिक तनाव व स्ट्रैस बढ़ जाता है। स्वभाव में चिड़चिड़Iपन बढ़ जाता है। व्यक्ति अपने को ऊर्जा-विहीन, असहाय व दुविधाग्रस्त महसूस करने लगता है।

बर्न-आउट कैसे पहचाने ?
ऐसे मे नकारात्मक सोच ज्यादा बढ़ जाती है। आत्मविश्वास व प्रेरणा मे कमी , अकेलापन, आक्रोश, नशे की लत, जिम्मेदारियो से भागने जैसे व्यवहार बढ़ जाते है। ऐसा व्यक्ति अपना फ्रस्टेशन दूसरों पर उतारने लगता है। ऐसे मे व्यक्ति हमेशा थका-थका व बीमार महसूस करता है। लगातार सिर और मांसपेशिओ मे दर्द, भूख व नींद मे कमी होने लगती है। अपने कार्य मे रुचि मे कमी, हमेशा असफलता का डर, अपना हर दिन बेकार लगने लगता है। ऐसे व्यक्ति दूसरों के साथ जरूरत से ज्यादा कठोर, असहनशील और चिड़चिड़ा हो जाता है। गैस्ट्रिक व ब्लड-प्रेशर का उतार-चढ़ाव असामान्य हो जा सकता है।
ऐसे परिवर्तनो का मतलब है कि अपने शारीरिक व मानसिक कार्य भार को सही तरीके से संभालने की जरूरत है। अगर संभव है तो कार्य-भार को कम कर देना चाहिए। साथ ही अपने लाइफ-स्टाइल को संयमित करना कहिए। अपनी आवश्यकताओ तथा समस्याओं को समझ कर उनका ध्यान रखना चाहिए।

समाधान-
ऐसी समस्याए अक्सर काम को लत (वर्कहोलिक) बना लेने वाले लोगों में ज्यादा पाया जाता है। इसलिए काम के साथ-साथ मनोरंजन, रचनात्मकता, मित्रों और परिवार के साथ समय बिताना भी जरूरी है। जीवन की खुशिया मानसिक तनाव काम करती है। हर काम का ध्येय सिर्फ जीत-हार, जल्दीबाजी या लक्ष्य-प्राप्ति नहीं रखना चाहिए। सकारात्मक सोच और दूसरों को समझने की कोशिश भी आवश्यक है। जिंदगी की परेशानियों और समस्याओं को सही नजरिए से समझना भी जरूरी है। समस्याओं से बचने के बदले उनका सामना करना चाहिए। काल्पनिक दुनिया से हट कर वास्तविकता और जरूरत के मुताबिक कठिनाइयों को सुलझाना चाहिए। कार्य-स्थल पर टीम मे काम करना, अपनी समस्यओं को बताना, नयी जिम्मेदारियों को सीखना भी सहायक होती है। कुछ लोग ‘ना’ नहीं बोल पाने के कारण अपने को काम के भार तले दबा लेते है। ‘ना’कहना सीखना चाहिए।
प्राणायाम, योग, योगनिद्रा, ध्यान, मुद्रा आदि की भी मदद ली जा सकती है। इससे तनावमुक्ति होती है। स्फूर्ति और आत्मविश्वास बढ़ता है। यह पूरे व्यक्तित्व को सकारात्मक और रचनात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। आयुर्वेद मे तुलसी को नर्व-टानिक तथा एंटिस्ट्रैस कहा गया है। अतः इसका भी सेवन लाभदायक हो सकता है,पर गर्भावस्था में बिना सलाह इसे ना लें।

Source: बर्न-आउट ( एक सामान्य मनोवैज्ञानिक समस्या )

Zeigarnik effect – Utilise its Positive side ज़ैगर्निक इफेक्ट के फायदे

 

मेरे एम ए की पढ़ाई के दौरान  एक दिन हमारे एक शिक्षक ने एक प्रयोग दिया, पर उसके बारे में कुछ नहीं बताया । अगली क्लास में , कुछ दिनों बाद उन्होंने सभी से उस एक्सपेरिमेंट का नतीजा जानना चाहा।

मेरे क्लास के सभी स्टूडेंट्स के रिजल्ट लगभग एक समान थे और मेरा रिजल्ट बिल्कुल उल्टा था।  शिक्षक ने कुछ देर में पूछा कि सारी रिजल्ट एक जैसे हैं  या  किसी का रिजल्ट इससे अलग आया है? मैं अपने अलग रिजल्ट से थोड़ा परेशान थी फिर भी मैं अपनी कॉपी के साथ अपनी टीचर के पास पहुंची।

तब उन्होंने बताया कि वह ऐसे  रिजल्ट का इंतजार कर रहे थे । उन्हों ने  बताया कि इसे  कहते हैं. जिसका अर्थ है कि अक्सर कुछ लोग अधूरे या बीच में रोक दिए गए काम को ज्यादा याद रख  हैं। यह  मनोविज्ञान का एक  फिनोमिना  हैं। इसका बहुत अधिक इस्तेमाल मनोरंजन की दुनिया में अधूरे सीरियल या अधूरी कहानियों के रूप में किया जाता है जिससे उनके प्रोग्राम की पॉपुलैरिटी बनी रहे । इसका लाभ हम भी उठा सकते हैं।

पढ़ाई – जिन विद्यार्थियों में यह स्वभाव है वह अपनी पढ़ाई को बीच बीच में रोक कर कुछ अन्य काम कर सकते हैं(जैसे- खेलना, मनोरंजन या अपनी हॉबी वाले काम ) और फिर पढ़ाई आगे बढ़ा सकते हैं । उन्हें पढ़ाई बेहतर याद रहेगी। यह उन्हें अच्छी याददाश्त प्रदान करेगा।

मल्टीटास्किंग – वे एक साथ में दो तरह के काम करने का फायदा उठा सकते हैं जिसमें एक काम के बाद कोई दूसरा अन्य काम करें और फिर वापस पहले काम पर आएं तो इस तरह से दो या तीन काम होते रहते हैं और चूँकि ऐसे लोगों में काम खत्म करने  की प्रवृति  मजबूत होती है, इसलिए काम तेजी से होता है अौर जल्दी खत्म होता है। साथ हीं  अगले काम को करने की प्रेरणा बनी रहती है

तनाव  दूर करना – अधूरे काम से  तनाव  होता है।  तनाव को खत्म करने के लिए एक आसान तरीका है, छोटे हलके काम करना। जिससे  काम खत्म होने के बाद लोग तनावरहित  महसूस करते हैं उनका आत्मविश्वास बढ़ता है।

 

अधूरा काम हमारी उत्सुकता को बनाए रखता है और हम उत्साहित रहते हैं। दुनिया के बहुत से खोज इसी स्वभाव के कारण हुए है इसलिए हमें अपनी उत्सुकता को बनाए रखना चाहिए और ज़ैगर्निक इफेक्ट के  सकारात्मक रूप का फायदा उठाना चाहिए।

क्या आपको अधुरी बातें ज्यादा याद रहती हैं? Zeigarnik effect #Psychology

 

In psychology, the Zeigarnik effect states that people remember uncompleted or interrupted tasks better than completed tasks. but it may vary person to person.

 

मनोविज्ञान में, ज़ैगर्निक प्रभाव में कह गया है कि कुछ लोगों को अधुरी बातें ज्यादा रहतीं है। इस प्रभाव के अनुसार   जो छात्र अपने  पढ़ाई के बीच-बीच में थोङा समय दूसरे काम मे लगाते  हैं (जैसे- खेलना, मनोरंजन या अपनी हॉबी वाले काम  ) उन्हें पढ़ाई बेहतर याद रहती है।

पत्रिकाअों व  टी. वी. के  अधुरे धाराविहिक अौर कहानियाँ इसलिये अक्सर हमें आगे की कहानी जानने के लिये प्रेरित करते है। पर यह जरुरी नहीं है कि यह सब  के ऊपर ऐसा असर ङालें । क्योंकि इस प्रभाव को बहुत से अन्य बात भी प्रभावित  करते हैं।

सेल्फ कंसेप्ट self concept #Psychology

Accept yourself as you are,

Never kill the parts, 

that you can’t live without !!!

 

What is self concept

Baumeister’s (1999) self concept definition:

“The individual’s belief about himself or herself, including the person’s attributes and who and what the self is”.

* The view you have of yourself (self image)
*How much value you place on yourself (self esteem or self-worth)
*What you wish you were really like (ideal self)

 

सेल्फ कंसेप्ट क्या है?

“व्यक्ति का अपने  स्वयं गुणों के बारे में ,और अपने व्यक्तित्व पर खुद का विश्वास ”

*आपका खुद के बारे में विश्वास (आत्म चित्र)
*आप अपने आप को कितना मूल्यवान समझते हैं (आत्मसम्मान या स्व-मूल्य )
*आप अपने अाप को कितना पसंद करते हैं (आदर्श स्वयं )

गुस्से की कड़ी Chain of anger #understandyourbehavior / #अपने व्यवहार को समझें

अक्सर ऐसा होता है,  हम बहुत सी छोटी -बड़ी बातों पर नाराज होते रहते हैं।
गुस्सा या आक्रोश भी एक तरह का एनर्जी है, जैसे विज्ञान में एनर्जी रूप बदल
लेती है पर खत्म नहीं होती है। ठीक इसी तरह गुस्सा भी जल्दी खत्म नहीं होता है।
इसकी कडी आगे बढ़ते रहती है। अगर हम  किसी एक व्यक्ति पर गुस्सा करते हैं,
तब वह आगे किसी और पर अपना गुस्सा निकालता है। और यह कड़ी कब तक
चलती रहती है जब तक कि कोई अपने गुस्से को कंट्रोल नहीं करता है, और

शांति से इस  बात को  नहीं संभालता  है।
गुस्से को शांति से संभालना तभी संभव है  जब हमारे- आपके अंदर खुशी हो
और आपका मन शांत हो।  किसी तरह की नाराजगी, परेशानी, आक्रोश या
चिंता से आप व्यथित न हो।

पर इसका यह मतलब नहीं है कि जिंदगी में कोई परेशानी ना हो।  जिंदगी की
परेशानियों के साथ शांत और खुश रहना सीखना जरूरी है।

खुशी अौर शांति दोनो बनाये रखने का  मेरी नजर में बस एक ही उपाय है वह
अौर  आपका अपना मन !! उसे समझे अौर अपना व्यवहार /मनोविज्ञान  को समझें ।
हाँ  एक अौर भी रास्ता है, वह है अध्यात्म या योग से  अपने पर नियंत्रित रखना 
अौर खुश  रहना सीख सकते हैं.

 

 

Image courtesy internet.

Psychology #understandyourbehavior /मनोविज्ञान #अपने व्यवहार को समझने का विज्ञान

मनोविज्ञान – क्या यह मन का विज्ञान है? इसके नाम से लगता हे, जैसे यह मन का विज्ञान है। यह अनुभव अौर व्यवहार का विज्ञान है। यह एक एेसा विषय है जो हमारे व्यवहार को समझने में मदद करता है। यह हमारी मानसिक प्रक्रियाओं, अनुभवों अौर व्यवहार का अध्ययन करता है। हम कब, क्या , क्यों, अौर कैसे य्यवहार करते हैं। इसे समझने का विज्ञान है।

आज के समय में मनोविज्ञान बङा महत्वपुर्ण हो गया है। यह विज्ञापन, व्यावसाय, लोगों के प्रतिक्रियाओं, जनमत या बाजार का रुझान, खेल अौर खिलाङियों , अपराध का व्यवहार सब कुछ समझने के काम आता है।

क्यों नहीं अपने व्यवहार को समझा जाये?– विचार, चिन्तन, भाव ,आसपास के वातावरण अौर घटनाअों का असर हम पर पङता है। हमारा व्यक्तित्व , बौद्भिकता, संवेदन, सीखना, स्मृति, चिन्तन हमारे व्यवहार पर असर ङालतें हैं। दरअसल, हमारे व्यवहार एवं मानसिक प्रक्रियाएं आपस में जुटे होते हैं। अतः अपने व्यक्तित्व को समझना जरुरी है। ताकि अपने व्यवहार को समझा जा सके।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

image from internet.

Kahaani 2: Some Incidents in Childhood Can Haunt Every Facet of One’s Life for Decades to Come

 

Kahaani 2 is really hitting hard on the issue of child abuse and it’s life long impact on the personality of the person. Such things distort the personality and self-esteem. POSCO Act  is a law for protection of children from sexual offences .  Thanks Kahaani 2 for spreading awareness.

**Caution: Spoilers Ahead***

Ye raatein nayi purani, aate jaate kehti hai koi kahaanii sings Lata Mangeshar’s silvery voice in the background as Vidya Sinha writes in her diary, reliving past days filled with laughter and contentment, with her wheelchair-bound daughter, Mini. The sunny day in the sleepy little town of Chandan Nagar pulls you in as mother and daughter cook, laugh and cheat over a game of ludo. Vidya feels that things are falling into place after years. You find her admission of wanting to write in her diary after a long time cryptic, but you leavePlease click here to continue reading

Life Is Better When You Are Laughing – on World Laughter Day

(World Laughter Day takes place on the first Sunday of May of every year . The first celebration was on January 10, 1998, in Mumbai, India, and was arranged by Dr. Madan Kataria, founder of the worldwide Laughter Yoga movement.)

Laughter is one of our most basic emotional responses, but we aren’t taught to laugh or even to smile; they occur naturally.

Laughter is clinically proven to have a powerful and positive effect on one’s health and wellbeing. Research states that laughter can be used as an effective strategy when it comes to self-managed health. With so much power to heal and renew, the ability to laugh easily and frequently is a tremendous resource for surmounting problems, enhancing your relationships, and supporting both physical and emotional health. However, it is believed that laughter as a therapy is often underutilized.

Laughter offers an array of benefits at different levels in numerous domains.

1. Social Benefits: Laughter, being contagious in nature, draws you closer to others. Most of the times, people return smiles and share a laugh. Laughter works in the form of a mirror neuron that makes people prone to mimicry and reciprocating.click here to continue reading

What You Should Know About Mental Health – Psychology

individuals stigma

 

 

Mental health is a state of well-being in which every individual realises his or her own potential, can cope with the normal stresses of life, can work productively and fruitfully, and is able to make a contribution to her or his community.

Mental health shows the level of psychological and emotional well-being. Our behaviour is guided by our mental health at every stage of life. Healthy, sound and good mental health is a boon as it provides the ability to enjoy life. However, mental illnesses are very common these days. According to the WHO, nearly half of the world’s population are affected by mental illness with an impact on their self-esteem, relationships and ability to function in everyday life.

Physical and mental health complement each other: Physical and mental health are closely associated. Recent studies have proved that a number of physical illnesses actually root from a mental health problem. These are known as Psychosomatic problems.

The body and the mind are intricately connected: In other words…… To continue reading Please click here

जीवन में रिक्तता का अहसास- एमटी नेस्ट सिंड्रोम, मनोविज्ञन Empty nest syndrome – Psychology

empty-nest

Empty nest syndrome is a feeling of loneliness, depression, sadness, anxiety and grief in parents, when their children leave home for job, further studies or to live on their own.

एमटी नेस्ट सिंड्रोम – बङे होने पर बच्चे नौकरी, अध्ययन या घर बसाने के लिये माता-पिता से अलग हो जाते हैं। जिससे माता-पिता मानसिक तनाव, चिंता, दु: ख और अकेलापन महसूस करते हैं । जैसे पंक्षियों के बच्चे बङे होते हीं घोंसला छोङ कर उङ जातें हैं, वैसे हीं बच्चे बङे होने पर घर छोङ कर वैसे हीं रिक्तता का अहसास माता-पिता को देते हैं। यह सिंड्रोम माता-पिता में अवसाद, उदासी, और दु: ख की भावनाएँ भर देता है।महिलाओं में एमटी नेस्ट सिंड्रोम पुरुषों से अधिक पाया गया हैं.
प्रभाव
1. जीवन के उतर्राध की समस्याँए
2. कुछ खोने की भावना
3. अवसाद और चिंता
4. आत्म पहचान खोने की भावना
5. वैवाहिक जीवन पर कुप्रभाव
6. महिलाओं में आम

सकारात्मक प्रभाव –
बच्चों के ना रहने से पारिवारिक काम के दायित्व अौर उससे संबंधित समस्याअों मे कमी आती है। जिससे माता-पिता को एक दूसरे के साथ जुड़ने के लिए नये अवसर मिलते है। फलतः आपसी संबंधों पर सकारात्मक प्रभाव पङता है।

1. पारिवारिक काम के बोझ में कमी –
2. परिवार संघर्ष में कमी
3. संबंधों में सुधार –

 

समाधान

1. सच्चाई स्विकार करते हुए अपने आप को परिवर्तन के लिए अनुकूल करने का प्रयास करना चाहिये।
2. बड़े फैसले तब तक स्थगित करना चाहिये, जब तक मनःस्थिति अनुकूल ना हो। यह तनाव के स्तर को कम रखेगा। उदाहरण के लिये बच्चों के साथ रहने का निर्णय या बड़ा घर बेच कर छोटे घर में रहने का निर्णय आदि तभी लेना चाहिये, जब मन शांत हो जाये।
3. मित्रों और सहयोगियों से मिलना जुलना व संबंध बनाना चाहिये।
4. एक ऐसी बातों की सूची बनाएँ जो आप कभी करना चाहते थें। अपने
रुचि, शौक अौर शगल को फिर से जीवन में लायें।
5. अपनी हाबी को पुनः जीवित करें। लेखन, चित्रकला, संगीत जो भी चाहें, शौक को आगे बढ़ायें।
6. प्राणायाम, योग, व्यायाम आदि जरुर करें।
7. सकारात्मक दृष्टिकोण अपनायें।

 

सुझाव –

कुछ लोग अतिसंवेदनशील होते हैं। उनके लिये यह समस्या स्वंय सुलझाना सरल नाहीं होता है। ऐसे अभिभावकों को काउन्सिलर की मदद लेनी चाहिये।

 

 

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