किसी ने ग़ालिब से पूछा – …..”कैसे हो?” ग़ालिब ने हँस कर कहा –
जिंदगी में ग़म है……
ग़म में दर्द है………….
दर्द में मज़ा है ………
अौर मज़े में हम हैं।
किसी ने ग़ालिब से पूछा – …..”कैसे हो?” ग़ालिब ने हँस कर कहा –
जिंदगी में ग़म है……
ग़म में दर्द है………….
दर्द में मज़ा है ………
अौर मज़े में हम हैं।
कुछ हँस कर, कुछ रो कर झेलते हैं।
दुःख सहने का अपना- अपना तरीका होता है।
क्या अच्छा हो, गर आँखों में आँसू पर होंठों पर मुस्कान हो।
Image from internet.
मेरी पाँच कविताएँ / My 5 Poems Published in She The Shakti, Anthology– POEM 5
नवरात्रि की अष्टमी तिथि ,
प्रौढ़ होते, धनवान दम्पति ,
अपनी दरिद्र काम वालियों
की पुत्रियों के चरण
अपने कर कमलों से
प्यार से प्रक्षालन कर रहे थे.
अचरज से कोई पूछ बैठा ,
यह क्या कर रहें हैं आप दोनों ?
अश्रुपूर्ण नत नयनों से कहा –
“काश, हमारी भी प्यारी संतान होती.”
सब कुछ है हमारे पास ,
बस एक यही कमी है ,
एक ठंडी आह के साथ कहा –
प्रायश्चित कर रहें है ,
आती हुई लक्ष्मी को
गर्भ से ही वापस लौटाने का.
Source: कन्या पूजन ( कविता )
Image – Sundarban temple,
by Rekha Sahay.
मेरी पाँच कविताएँ / My 5 Poems Published in She The Shakti, Anthology– POEM 4
इस दुनिया मॆं मैने
आँखें खोली.
यह दुनिया तो
बड़ी हसीन
और रंगीन है.
मेरे लबों पर
मुस्कान छा गई.
तभी मेरी माँ ने मुझे
पहली बार देखा.
वितृष्णा से मुँह मोड़ लिया
और बोली -लड़की ?
तभी एक और आवाज़ आई
लड़की ? वो भी सांवली ?
Source: मैं एक लड़की ( कविता 1 )
मेरी पाँच कविताएँ / My 5 Poems Published in She The Shakti, Anthology– POEM 3
उसके पति ने कहा ,
सजावट की तरह रहो ,
कौन तुम्हें मदद करेगा ?
यह पुरुषों की दुनियाँ हैं.
सब के सब , कभी न कभी
ऐसे रिश्ते बनाते हैं.
अगर तुमने मेरी जिंदगी मॆं
ज्यादा टाँग अडाई ,
तब सब से कह दूँगा –
यह औरत पागल हैं.
उसने नज़रें उठाई और कहा-
सब के सब तुम्हारे जैसे नहीँ हैं.
तुम्हारे ये तरीके और हथियार पुराने हो गये ,
मुझ पर काम नहीँ करते.
हाँ , जो तुम जैसे हैं ,
वहीं तुम्हारा साथ देते हैं.
मैं नारी हूँ, रानी हूँ, शक्ति हूँ।
इसलिये शर्मिंदा होने का समय तुम्हारा हैं.
मेरा नहीँ.
आज़ के आधुनिक समय में अभी भी कुछ ऐसे लोग मिल जाते हैं , जो नारी को समानता का दर्ज़ा देने में विश्वाश नही रखते.
Source: तरीके और हथियार ( कविता )
मेरी पाँच कविताएँ / My 5 Poems Published in She The Shakti, Anthology– POEM 1
वह कभी आइने में अपना सुकुमार सलोना चेहरा देखती
कभी अपनी माँ को।
दिल में छाले, सजल नेत्र, कमसिन वयस, अल्पशिक्षित
कुछ माह की विवाहिता,
पति के चरित्रहिनता व बदमिजाजी से तंग,
वापस आई पिता ग़ृह, अपना घर मान कर।
माँ ने वितृषणा से कहा –
पति को तुम पसंद नहीं हो।
तुम्हारा चेहरा नहीं, कम से कम भाग्य तो सुन्दर होता।
वह हैरान थी, माँ तो विवाह के पहले से जानती थी
उसके ससुराल की कलकं-कथा,
अौर कहा था – घबराओ नहीं,
जल्दी हीं सुधर जायेगा।
“मेहंदी रंग लायेगी”
फिर आज़ यह उसके भाग्य अौर चेहरे की बात कहां से आई?
Where there is pain, the cure will come.
~ Rumi
जब छोटी थी, बङे-बङे सपने देखा करती,
अब पहले की छोटी-छोटी बातें याद आती हैं।
खुशियों अौ गम के खेल में यह समझ आया,
ये सब आती -जाती रहती है
अौर
कोई ना कोई सबक दे कर जाती हैं।
Source: जला हुआ जंगल छुप कर रोता रहा…..
मित्र आगमन पर नंगे पैर दौङ पङे कृष्ण,
ना कान्हा ने सुदामा को आंका।
ना राम ने सबरी , हनुमान को नापा।
हम किसी से मिलते हीं सबसे पहले,
एक- दूसरे को भांपते है, आंकते है,
आलोचना -समालोचना करते हैं।
तभी सामने वाले का मोल तय करते हैं।
रुप, रंग, अौकात …..
देख कर लोगों को पहचानते हैं।
भूल जाते हैं , अगर ऊपरवाला हमारा मोल लगाने लगेगा,
तब हमारी पहचान क्या होगी ? हमारा मोल क्या होगा?
Indispose, Edition 172 –How do you feel when people judge you? Do you judge people as well? #JudgingPeople
image from internet.
Take someone who doesn’t keep score,
who’s not looking to be richer, or afraid of losing,
who has not the slightest interest even
in his own personality: she/ he’s free.
~ Rumi
Image from internet
You must be logged in to post a comment.