
जो उलझ गई वो है
ज़िंदगी साहब।
सब की है अपनी ज़िंदगी
अपनी राहें।
कई बार सुलझती सी,
कई बार उलझने और
उलझती सी।
ना सज्दा ना जप के
मनके राह सुझाते है।
दिल परेशान है,
ये रास्ते किधर जातें है?
अब उलझनों को
आपस में उलझने
छोड़ दिया है।
यह सोंच कर कि
उन्हें बढ़ाने से
क्या है फ़ायदा?
ज़िंदगी ना उलझी
तो क्या है मज़ा?









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