मृग तृष्णा

रिश्तों की ख़ुशबू

कुछ लड़ाई-झगड़े

मोहब्बत भरें होतें है।

ग़र नाराज़गी में मीठास,

ग़ुस्से में प्यार,

लहजे में अपनापा हो।

तो रिश्तों की ख़ुशबू

फैलती रहती है।

दर्द की कायनात

दर्द की कायनात और

हिसाब भी कुछ अजीब है।

क़र्ज़ की तरह बढ़ता है।

ना तरकीब किश्तों की,

ना सूद-ब्याज का हिसाब।

ना ठहरता है

ना गुजरता है।

हँस कर छलो तो दर्द बढ़ता है।

जितना भागो, पकड़ता है।

दर्द कहाँ ले जाता है?

यह तय है ज़िंदगी

की राहें और लोगों

को बदलता है।

ग़ुरूर

स्वाभिमान अच्छा है

ग़ुरूर नहीं।

कितने हिचक के बाद

माँगते हैं लोग मदद,

अपनी ख़ुद्दारी दरकिनार कर।

मदद ना करो तो है अच्छा,

मदद कर याद दिलाने से।

स्वाभिमान अच्छा है,

ग़ुरूर दिखाने से।

भरोसा

ज़िंदगी की हर जंग में,

हर महाभारत में आश्वस्त हैं।

क्योंकि जीवन के

हर सैलाब में तुम्हें साथ

ले कर चल रहें हैं।

भरोसा है,

जब तुमने जंग दिया है

तो जय दिलाने सारथी

बन तुम आओगे हीं।

ज़िंदगी के रंग -231

ज़िंदगी के जंग में,

जब हम अपना सम्मान करना,

अपने लिए खड़े होना

सीखने लगते है।

तब कई लोग हम से

दूर हो जातें है।

वे साथ नहीं छोड़ते

क्योंकि वे कभी

साथ थे हीं नहीं।

बस दिखने लगती है

सब की फ़ितरत।

जो अपने हैं,

वो तो हमेशा

साथ खड़े मिलेंगे।

Why We Love Narcissists – Have you ever wondered why selfish, arrogant, and entitled individuals are so charming? These narcissistic people have parasitic effects on others/ society. Narcissists manipulate credit and blame in their favor.
Research by January 15, 2014

दिल की बातें

किसी और की बातों

और राय को बोझ

ना बनने दो।

सुन सब की लो।

पर सुनो अपने दिल की।

चिटियाँ और इंसान

चींटियाँ हों या इंसान।

ज़िंदगी जीने की

जद्दो-जहद में,

क्या दोनों

एक सी ज़िंदगी

नहीं जी रहे?

ज़िंदगी के रंग – 230

जो उलझ गई वो है

ज़िंदगी साहब।

सब की है अपनी ज़िंदगी

अपनी राहें।

कई बार सुलझती सी,

कई बार उलझने और

उलझती सी।

ना सज्दा ना जप के

मनके राह सुझाते है।

दिल परेशान है,

ये रास्ते किधर जातें है?

अब उलझनों को

आपस में उलझने

छोड़ दिया है।

यह सोंच कर कि

उन्हें बढ़ाने से

क्या है फ़ायदा?

ज़िंदगी ना उलझी

तो क्या है मज़ा?

स्याह रात

जाड़े की सुबह बादलों

से लुकाछुपी खेलती

सुनहरी धूप सरकती,

पैरों तक आ उसे

गुनगुना कर गई।

ख़ुश-गवार, फ़िज़ा परिंदों

की चहचहाहट…. हर सुबह

एक नई रंग ले कर आती है।

स्याह रात के ख़िलाफ़

जंग जीत कर आती है।