
चोट से टूटे दिल से,
दिमाग़ ने पूछा –
तुम ठीक हो ना?
तुम्हें बुरा नहीं,
ज़्यादा भला होने की
मिली है सज़ा।
ऐसे लोगों की
दुनिया लेती है मज़ा।
पेश नहीं आते दिल से,
दिमाग़ वालों से।
प्यार करो अपने आप से,
मुझ से।
ज़िंदगी सँवर जाएगी।

चोट से टूटे दिल से,
दिमाग़ ने पूछा –
तुम ठीक हो ना?
तुम्हें बुरा नहीं,
ज़्यादा भला होने की
मिली है सज़ा।
ऐसे लोगों की
दुनिया लेती है मज़ा।
पेश नहीं आते दिल से,
दिमाग़ वालों से।
प्यार करो अपने आप से,
मुझ से।
ज़िंदगी सँवर जाएगी।

बाती की लौ भभक
कर लहराई।
बेचैन चराग ने पूछा –
क्या फिर हवायें सता रहीं हैं?
लौ बोली जलते चराग से –
हर बार हवाओं
पर ना शक करो।
मैं तप कर रौशनी
बाँटते-बाँटते ख़ाक
हो गईं हूँ।
अब तो सो जाने दे मुझे।

दे कर चुभन और
हाल पूछते हैं।
ना मिलने पर
सवाल पूछतें हैं।
कुरेदतें हैं,
ज़ख्मों को
मलहम के बहाने।
उन लोगों का
क्या किया जाए?

शीशमहल
कौन खोजता हैं दूसरों में
कमियाँ हीं कमियाँ ?
उसमें अपने आप को
ढूँढने वाले।
यह शीश महल
देखने जैसा है।
जिधर देखो अपना हीं
अक्स और परछाइयाँ
देख ख़ुश हो
लेते है ये लोग।

कद्र
किसी के लिए सब कुछ
दिल से करो ।
फिर भी तुम्हारे वजूद
का मोल ना हो।
कद्र न हो तुम्हारी।
तब दूरियाँ हीं
समझदारी है।

कुंदन
ज़िंदगी के इम्तहानों में
तप कर सोना बने,
कुंदन हुए या
हुए ख़ाक।
यह तो मालूम नहीं।
पर अब महफ़िलें
उलझतीं नहीं।
बेकार की बातें
रुलातीं नहीं।
ना अपनी ख़ुशियाँ
कहीं और ढूँढते हैं ,
ना देते है किसी
को सफ़ाई ।
हल्की सी
मुस्कान के साथ,
अपनी ख़ुशियों पर
यक़ीं करना सीख रहें हैं।

ज़ुबान
ज़ुबान बंद रखना
तो ठीक है।
पर बिन बोले बातों का
वजन, बोझ बन जाता है।
और चुभता है, टूटे आईने
की किरचियों सा।
खामोशी की अदा
तब अच्छी है।
जब सुनने वाले के
पास मौन समझने
वाला दिल हो।
वरना लोग इसे
कमजोरी समझ लेतें हैं।

रौशनी
सूरज डूबेगा नहीं,
तब निकलेगा कैसे?
चाँद अधूरा नहीं होगा,
तब पूरा कैसे होगा?
अँधेरा नहीं होगा,
तब रौशनी का मोल कैसे होगा?
अमावस नहीं होगा,
तब पूर्णिमा कैसे आएगी।
यही है ज़िंदगी।
इसलिय ग़र चमक कम हो,
रौशनी कम लगे।
बिना डरे इंतज़ार करो।
फिर रौशन होगी ज़िंदगी।
इम्तिहान
ज़िंदगी क्या तुझे
ख़बर है?
कितनी बार टूट कर
यहाँ पहुँचें है?
तू बस परखते रह,
नए-नए इम्तिहान
लेती जा।

ज़िंदगी की राहें
मज़बूत दिखने वालों
की सच्चाई यह होती है,
कि वे कई बार टूट
कर बने होते हैं।
ज़िंदगी की राहों पर,
वे अकेला चलना
सीख चुके होतें हैं।
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