
कल तक कंकर था।
तराश कर हीरा बन गया।
कल तक कंकर था।
बहती नर्मदा में ,
तराश कर शंकर बन गया।
तराशे जाने में दर्द है,
चोट है।
पर यह अनमोल बना देता है।

कल तक कंकर था।
तराश कर हीरा बन गया।
कल तक कंकर था।
बहती नर्मदा में ,
तराश कर शंकर बन गया।
तराशे जाने में दर्द है,
चोट है।
पर यह अनमोल बना देता है।

आना-जाना जीवन
का दस्तूर है।
ग़म ना कर।
मौसम, साल, महीने, दिन…
लोग बदलते रहतें हैं।
रोज़ बदलती दुनिया
में अपने बने रहें।
जिनसे दुख-सुख कह ले,
कभी हँस ले,
कभी रो ले,
यह अपनापा बना रहे।
Happy 31 st December!!!

जब छोटे थे दौड़ते,
गिरते और उठ जाते।
चोट पर खुद हीं
मलहम लगाते थे।
आज़ भी ज़िंदगी की
दौड़ में वही कर रहें हैं।

सब खो दिया।
अब क्यों डरें?
कुछ और अब
ना चाहिए।
वरना फिर डरना
सीख जाएँगें।

तेरे जाने के बाद,
कई बार तेरी ख़ुशबू से
गुफ़्तुगू की है।
ख़्वाबों में आ कर
कई बार जगाया तुमने।
पर यह मिलना भी
कोई मिलना है?

हर दिल में कितने
ज़ख़्म होते हैं….
ना दिखने वाले।
कुछ चोट, समय के
मरहम से भर जातें हैं।
कुछ रिसने वाले
नासूर बन, रूहों तक
उतर जातें हैं।
धीरे-धीरे ज़िंदगी
सिखा देती है,
दिल में राज़ औ लबों
पर मुस्कुराहट रखना।

ज़िंदगी के सफ़र में
अब जहाँ आ गए हैं।
बातें अब हम छुपाते नहीं।
लोगों के सिखाए
अदब के लिए,
अपनी ख्वाहिशें दबाते नहीं।
नक़ली सहानुभूति
दिखाने वालों से घबराते नहीं।
कड़वी बोली अब डराती नहीं।
गुनगुनी धूप
मुस्कुराना सिखाती है।
ख़ुद ज़िंदगी खुल कर
जीना सीखती है।

अधूरी मुहब्बतों की
दास्ताँ लिखी जाती है।
राधा और कृष्ण,
मीरा और कान्हा को
सब याद करते हैं।
किसे याद है कृष्ण की
आठ पटरानियों और
16 हजार 108 रानियों की?
चाँद को रोशन
करता है सूरज,
ख़ुद को जला-तपा कर,
अनंत काल से ।
क्या इंतज़ार है उसे,
कभी तो मिलन होगा?
नहीं, आफ़ताब को मालूम,
मिलन नहीं होगा कभी।
फिर भी जल रहा है…….
बे-लौस, निस्वार्थ मोहब्बत में ।

ज़िंदगी में ज़ख़्म
लगते रहेंगे।
उन्हें भूल जाओ
तो कोई बात नहीं।
पर सबक़ ना भूलना।
ग़र भूल गए तो
ज़िंदगी गुरु बन
फिर-फिर सिखाएगी।
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