
समुंदर की लहरें,
जमीं का ज़ख़्म भरने की
कोशिश में मानो बार बार
आतीं-जातीं रहतीं है।
वक्त भी घाव भरने की
कोशिश करता रहता है।
ग़र चोट ना भर सका,
तब साथ उसके
जीना सिखा देता है।

समुंदर की लहरें,
जमीं का ज़ख़्म भरने की
कोशिश में मानो बार बार
आतीं-जातीं रहतीं है।
वक्त भी घाव भरने की
कोशिश करता रहता है।
ग़र चोट ना भर सका,
तब साथ उसके
जीना सिखा देता है।

ज़िंदगी के सफ़र में लोग आते हैं।
कुछ दूर कुछ साथ निभाते हैं।
कुछ क़ाफ़िले में शामिल हो
दूर तलक़ जातें हैं।
कुछ मुस्कान और कुछ
आँसुओं के सबब बन जातें हैं।
कुछ ख़्वाबों में बस कर
रह जातें हैं।

जिस रौशनी को
हम खोज रहें हैं।
वह तो है हमारे अंदर।
हम सब हैं,
चमकते-दमकते सितारें
इस ख़ूबसूरत काया
के अंदर।

नज़रें झुका कर,
उठा कर,
पलकें झपका
कर अश्कों को क़ाबू
करना सीखा था, पर
आँखें ऐन वक्त पर
धोखा दे गईं।
जब आँखों को आँखें दिखाईं,
जवाब मिला
हमारी नहीं जज़्बातों
की ख़ता है।

ज़िंदगी ने कहा,
ध्यान से पढ़ो मेरा सबक़ ।
ये नसीहत
हमेशा काम आएँगे।
वरना इम्तहान
बार-बार होता रहेगा।

कल तक कंकर था।
तराश कर हीरा बन गया।
कल तक कंकर था।
बहती नर्मदा में ,
तराश कर शंकर बन गया।
तराशे जाने में दर्द है,
चोट है।
पर यह अनमोल बना देता है।

आना-जाना जीवन
का दस्तूर है।
ग़म ना कर।
मौसम, साल, महीने, दिन…
लोग बदलते रहतें हैं।
रोज़ बदलती दुनिया
में अपने बने रहें।
जिनसे दुख-सुख कह ले,
कभी हँस ले,
कभी रो ले,
यह अपनापा बना रहे।
Happy 31 st December!!!

जब छोटे थे दौड़ते,
गिरते और उठ जाते।
चोट पर खुद हीं
मलहम लगाते थे।
आज़ भी ज़िंदगी की
दौड़ में वही कर रहें हैं।

सब खो दिया।
अब क्यों डरें?
कुछ और अब
ना चाहिए।
वरना फिर डरना
सीख जाएँगें।

तेरे जाने के बाद,
कई बार तेरी ख़ुशबू से
गुफ़्तुगू की है।
ख़्वाबों में आ कर
कई बार जगाया तुमने।
पर यह मिलना भी
कोई मिलना है?
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