दुआओं में नाम ना होगा !

दूसरों को दर्द देने वाले को

मालूम होती है ख़ता अपनी।

क्यों जाया करना लफ़्ज इन पर?

इन्हें ना दे बद-दुआ, पर तय है

दुआओं में नाम ना होगा इनका।

जब कोई चोट और दर्द दे कर,

अपनी हीं तकलीफ़ का राग सुनाता है,

तब एक पुरानी कहावत याद आती है –

सूप बोले तो बोले, चलनी बोले जिसमें सौ छेद।

Psychological Fact – One may end up feeling exhausted, depressed, anxious, frustrated, and physically sick when Toxic people act as a victim.

ख्वाहिशें तो अनंत हैं!

क्यों आज़ लोग खुश और संतुष्ट नहीं?

क्यों लोग स्वयं को नहीं, दूसरों को देख रहें हैं?

आध्यात्मिक-मानसिक प्रगति से दूर,

भाग रहें हैं भौतिक प्रगति की ओर।

पर है स्वयं के गोली-बारी, हिंसा से लहू-लुहान।

गीता ने सदियों पहले बताया,

जो तुम्हारे पास है उसमें संतुष्ट, ख़ुश रहना सीखो,

क्योंकि ख्वाहिशें तो अनंत हैं।

सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।

मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः।।12.14।।

अर्थ- संयतात्मा दृढ़निश्चयी योगी सदा सन्तुष्ट है।

जो अपने मन और बुद्धि को मुझमें अर्पण किये हुए है?

वह मुझे प्रिय है। (भगवद् गीता अध्याय 12 श्लोक 14)

Salman Rushdie Stabbed In Neck At New York Event, Taken To Hospital. https://www.ndtv.com/world-news/author-salman-rushdie-attacked-on-stage-at-an-event-in-new-york-news-agency-pti-3249899/amp/1

परिवर्तन

मृत यादें

मृत यादें मर कर भी दर्द देतीं है।

ग़र अतीत के घाव नहीं भरे

तो वे रिसते रहेंगे।

यादों के दाग,

ज़ख्मों के जलन

अपने होने का एहसास देते रहेंगे।

अतीत से समझौता कर

आगे निकल जाना ज़रूरी है।

ज़िंदगी के शतरंज

ज़िंदगी के शतरंज पर

सम्बंधों की गोटियाँ ना खेलो।

ग़र किसी की ज़्यादती

बिना जवाब दिए झेल गए,

तब जवाब ऊपरवाला देता है।

महाभारत रचने में महारत रखने वालों

का भी यही हश्र हुआ था।

क़सूर और सज़ा

कहते हैं त्रुटि कपड़ों में हैं।

पर वे प्राचीन मूर्तियाँ जो मंदिरों में पाषाणों पर

युगों-युगों पहले उकेरी गई सौंदर्यपूर्ण मान।

उन्हें अश्लील या अर्ध नग्न तो नहीं कहते।

आज़ कहते हैं ग़लती लड़कियों की है।

क्या तब लोगों की निगाहें सात्विक थीं

या तब सौंदर्य बोध अलग था।

सुनते है, सब दोष मोबाइल का है।

बौद्ध भिक्षुकों के तप स्थली अजन्ता गुफाओँ में

उकेरे बौद्ध धर्म दृश्य और नारी सौंदर्य शिल्पकारी,

उत्कृष्ट कलात्मकता की है पराकाष्ठा।

हमारी प्राचीन संस्कृति कहती कुछ और है।

और आज कुछ और कहा जाता है।

भूल कहाँ है? गलती किसकी है?

चूक कहाँ हुई? क़सूर किसका?

सज़ा किसे?

गुनाहगार कोई, सज़ा पाए बेगुनाह?

ज़िंदगी के रंग

कई जंग अक्सर हम अपने आप से हैं लड़ते,

ख़्वाबों, ख़्वाहिशों और दुनियादारियों की।

कभी दिल से जंग पेचीदागियों भरा!

कभी दिमाग़ से मामला इश्क़ भरा।

कभी पूरे होते ख़्वाब, कभी क़त्ल होतीं ख्वाहिशें।

फिर भी सुर्ख़-रु दिल धड़कता रहता है।

सब लड़ते रहते है अपनी-अपनी जंग।

ये हैं ज़िंदगी के रंग।

मायूसियाँ

अक्सर लोग हमें और हम लोगों को

आँखों हीं आँखों में, बिना समझे,

पूरे भरोसे के साथ पढ़ते रहते है।

कभी ख़त,कभी सागर की तहरीरों,

कभी परियों, देव, दानवों, दोस्तों,

दुश्मनों की कहानियों की तरह।

पर भूल जातें हैं कि जो ग़लत पढ़ लिया

सामने वाले को तो

सज़ा औ मायूसियाँ ख़ुद को मिलेंगी।

अनजाने हीं खो देंगे किसी हमदम को।

“गुरु मतंग और शबरी” Happy Guru Purnima!

“इंतज़ार आत्मा से हो तो पूरी होती हैं” – शबरी से राम ने कहा। “रावण तो बहाना है। कुछ कहानियाँ रची जातीं हैं, युगों-युगों तक कहे जाने के लिए। वे इतिहास बन जाती हैं । लीला तो रची जाती हैं, इंसानों को समझाने के लिय। रावण तो बस बहाना है। मुझे तेरे पास आना था।”

फिर कहा राम ने – “पशु बली से द्रवित होते हैं क्या वनों में बसे भील? क्यों हुई द्रवित तू? क्यों यौवन में किया गृह त्याग? तेरी पुकार कैसे करता मैं अनसुनी। चल कर आया तुम तक। बताने तुझे, ना रहता है यौवन-सौंदर्य, ना ऊँच-नीच।सिर्फ़ रह जाती है अटूट भक्ति, जब श्रमणा बन जाती है शबरी।”

तेरे एक रक्त बूँद से दरिया हुआ रक्ताभ और तेरे हीं चरण रज से जल हुआ स्वच्छ। तब भी नहीं जाना तुने क्या अपना तप और बल? ना तूने मुझे देखा, ना जाना। बरसों से, मेरे जन्म पूर्व से ताकती रही राहें मेरी। चखती-चुनती मीठे बेर, सजाती रोज़ पुष्प। सोंच, ना जाने किस पल आ जायें राम? समाधिस्थ होते गुरु मतंग के आशीष के भरोसे प्रतिक्षारत – “राम करेंगे तेरी चिंता और धरेंगे ध्यान और दिलाएँगे मोक्ष। ना ढूँढ उन्हें, वे ढूँढेंगे तुझे।”

शबरी, काल को तुने नहीं जाना क्या? देता नहीं किसी को एक पल ज़्यादा, ना एक पल कम। आयु पूरी होते ले जाने का बना लेता है बहाना।ना भ्रम में रह। रावण भी जाता किसी ना किसी विधि संसार से। रावण तो एक बहाना था। अम्मा, मुझे तो तेरे पास आना था।

शुभ गुरु पूर्णिमा !!

ब्रह्मांड में गूँजते कम्पन

सब उलझे हैं पाने में सिर्फ़ स्कूल-कॉलेज का ज्ञान,

दुनियावी साधन, धन और मान।

नहीं पाते जान,

अपने अंदर और ब्रह्मांड में गूँजते कम्पन,

पर कॉसमिक एनर्जी की करते हैं बात।

ठीक कह गए हैं कबीर-

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,

ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।