थे राधा बनने की चाह में।
कई नज़रें उठी,
सिर्फ़ लालसा भरी चाह में।
माँगा इश्क़ भरी नज़रें,
मिला बदन भर चाह।
समझ ना आया, तह-दर-तह
तह-ए-इश्क़ में सच्चा कौन, झूठा कौन?
और हर इल्ज़ाम इश्क़ पर आया।
पर कृष्ण ना मिले।
महादुर्गाष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

थे राधा बनने की चाह में।
कई नज़रें उठी,
सिर्फ़ लालसा भरी चाह में।
माँगा इश्क़ भरी नज़रें,
मिला बदन भर चाह।
समझ ना आया, तह-दर-तह
तह-ए-इश्क़ में सच्चा कौन, झूठा कौन?
और हर इल्ज़ाम इश्क़ पर आया।
पर कृष्ण ना मिले।
महादुर्गाष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

उम्र-ए-रफ़्ता ना लौटे,
क्या फ़र्क़ है पड़ता?
उजालों का भी समय है ढलता।
सूरज भी है ढलता।
बस ज़िंदगी ख़ूबसूरत
और हो सुकून भरी।
यही है कामना।
उम्र-ए-रफ़्ता ना लौटे,
क्या फ़र्क़ है पड़ता?
The UN is marking IDOP by encouraging
countries to draw attention to and
challenge negative stereotypes and
misconceptions about older persons
and ageing, and to enable older persons
to realize their potential.
2022 Theme:Resilience of Older Persons
in a Changing World

ज़द्दोजहद में ज़िंदगी के,
थके, बेचैन दिन,
कट जाते है निशा के इंतज़ार में।
आ कर गुज़र जाती है रात भी,
किसी याद में।
रात की आग़ोश में,
थक कर सो जाते हैं ख़्वाब।
जागते रह जातें है
चराग़ और महताब…..चाँद।
जारी रहती है सफ़र-ए- ज़िंदगी।

दर्द हो या ख़ुशियाँ,
सुनाने-बताने के कई होते हैं तरीक़े।
लफ़्ज़ों….शब्दों में बयाँ करते हैं,
जब मिल जाए सुनने वाले।
कभी काग़ज़ों पर बयाँ करते है,
जब ना मिले सुनने वाले।
संगीत में ढाल देते हैं,
जब मिल जाए सुरों को महसूस करने वाले।
वरना दर्द महसूस कर और चेहरे पढ़
समझने वाले रहे कहाँ ज़माने में?

मालूम है कि ज़िंदगी है एक रंगमंच
और हम सब किरदार।
पर कौन है शेष रह गए कई अनुत्तरित
सवालों के जवाब का ज़िम्मेदार ?
सब जाएँगें ख़ाली कर बस्ती एक दिन।
पर ऐसे बिन बताए जाता है कौन?
बरहम….. आक्रोश, नाराज़गी जाती नहीं।
ज़वाब मिले, इतना तो मेरा हक़ बनता था।

बिना मुझसे पूछे,
बिन मेरे अनुमति।
तुमने मेरे पत्थरों से
बनाया था आशियाँ अपना।
बस मैं उसे हीं वापस ले जा रही हूँ,
अपनी बहती धार में।
तब तुम शक्तिशाली थे।
आज़ मैं प्रचंड हूँ।


जिस्म तो पेड़, पहाड़
औरत, पुरुष सभी के होते है।
ना जाने यह जुनून, यह सौंदर्य-बोध कब बना,
जिसमें नारी और पुरुष सिर्फ़
जिस्म सौंदर्य से मापे जाने लग़े।
आज के सौंदर्यशास्त्र में किसी को चाहिए,
जीरो फ़िगर, किसी को चाहिए मसलस।
लीपोसक्शन या मिले सिन्थेटिक सिंथोल से।
सेहत का जो भी हो।
हुस्न, जिस्म से आगे भी होता है,
यह ख़्याल क्यों नहीं आता ज़ेहन में?
Synthol is a substance used by body builders as a temporary implant which is injected deeply into the muscle. The enlargement effects are immediate. Synthol is used to enlarge their volume (for example triceps, biceps, deltoids, muscles of the calf). The side effects of synthol are manifold and they can also cause a damage of nerves.

पूछा जलते और ढलते सूरज ने।
तपन के बावजूद हम साज़िश करते रहते है
ताकि चाँद तुम दमक सको
मेरी प्रतिबिंबित रोशनी से।
मिलन ना लिखा हो हमारा।
पर ख्वाहिश है कि
चाँद तेरी दूधिया चाँदनी चमके
आफ़ताब….सूरज की रौशनी से।

Topic by yourquote
जिसका लेखक, डायरेक्टर सब है ऊपरवाला,
और मुख्य पात्र हैं हम।
कब क्या होगा, किसी को नहीं मालूम।
नए नए ट्विस्ट और टर्न के साथ
अग़ल दृश्य हमेशा है एक मिस्ट्री।
दृश्य है बदलते रहते।
बस नहीं रहता
किसी को इस
फ़िल्म के द एंड
या अंत का इंतज़ार।

Topic by YourQuote.
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