तारों भरी रात

तारों की कहकशाँ से सजी रात है,

आकाश में छिटके चाँद-तारे, शरद पूर्णिमा की रात।

धरा पर राधा -कान्हा करते महारास,

वृंदावन की अद्भुत धूम में महारासलीला की रात।

आध्यात्म और प्रेमोत्सव की निराली रात।

सोलह कलाओं से पूर्ण चंद्रमा की,

बिखरी चाँदनी में गोपियाँ नाचती रही,

बरसात रहा अमृत सारी-सारी रात।

रक़्स…नृत्य में डूबी तारों भरी रात है।

(अश्विन शुक्ल पक्ष पूर्णिमा / शरद पूर्णिमा, रविवार, 09 अक्टूबर 2022 )

बता वक्त ख़ता ढूँढे या सज़ा

प्यासे मृग सी कशाकश में,

मृगतृष्णा के पीछे भागते

बीतती है दिन-रात।

कट जाती है ज़िंदगी फ़क़त

मरीचिका सी उलझन में।

बता वक्त ख़ता ढूँढे या सज़ा?

इश्क़-ए-जुगलबंदी

दो दिलों…रूहों की जुगलबंदी है इश्क़।

इश्क़ के हैं कुछ अदब-कायदे।

अज़ाब-ए-हिज्र-ओ-विसाल…

मिलन और वियोग में जीना

है सिखाती इश्क़ की जुगलबंदी।

टूट जाए यह जुगलबंदी,

फिर भी टूट कर जीना है सीखती।

एक दूसरे के लय-ताल पर

जीना है इश्क़-ए-जुगलबंदी।

Topic by YourQuote.

रावण है, इसलिये राम याद आतें हैं ! ( शुभ विजयदशमी)

सदियाँ और युग बीते,

रावण कभी नहीं मरा।

था अति विद्वान।

पर जीत नहीं सका अहंकार अपना।

विजया और रावण दहन सीख है,

जीत सको तो जीत लो अहंकार अपना।

ना रखो कई चेहरे,

दुनिया में कई चेहरे वाले कई रावण है,

इसलिये राम याद आतें हैं।

तह-ए-इश्क़ (महादुर्गाष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं)

थे राधा बनने की चाह में।

कई नज़रें उठी,

सिर्फ़ लालसा भरी चाह में।

माँगा इश्क़ भरी नज़रें,

मिला बदन भर चाह।

समझ ना आया, तह-दर-तह

तह-ए-इश्क़ में सच्चा कौन, झूठा कौन?

और हर इल्ज़ाम इश्क़ पर आया।

पर कृष्ण ना मिले।

महादुर्गाष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

क्या फ़र्क़ है पड़ता (International Day of Older Persons -1 October)

उम्र-ए-रफ़्ता ना लौटे,

क्या फ़र्क़ है पड़ता?

उजालों का भी समय है ढलता।

सूरज भी है ढलता।

बस ज़िंदगी ख़ूबसूरत

और हो सुकून भरी।

यही है कामना।

उम्र-ए-रफ़्ता ना लौटे,

क्या फ़र्क़ है पड़ता?

The UN is marking IDOP by encouraging

countries to draw attention to and

challenge negative stereotypes and

misconceptions about older persons

and ageing, and to enable older persons

to realize their potential.

2022 Theme:Resilience of Older Persons

in a Changing World

रात की आग़ोश में

ज़द्दोजहद में ज़िंदगी के,

थके, बेचैन दिन,

कट जाते है निशा के इंतज़ार में।

आ कर गुज़र जाती है रात भी,

किसी याद में।

रात की आग़ोश में,

थक कर सो जाते हैं ख़्वाब।

जागते रह जातें है

चराग़ और महताब…..चाँद।

जारी रहती है सफ़र-ए- ज़िंदगी।

दर्द और ख़ुशियाँ

दर्द हो या ख़ुशियाँ,

सुनाने-बताने के कई होते हैं तरीक़े।

लफ़्ज़ों….शब्दों में बयाँ करते हैं,

जब मिल जाए सुनने वाले।

कभी काग़ज़ों पर बयाँ करते है,

जब ना मिले सुनने वाले।

संगीत में ढाल देते हैं,

जब मिल जाए सुरों को महसूस करने वाले।

वरना दर्द महसूस कर और चेहरे पढ़

समझने वाले रहे कहाँ ज़माने में?

इतना तो मेरा हक़ बनता था!

मालूम है कि ज़िंदगी है एक रंगमंच

और हम सब किरदार।

पर कौन है शेष रह गए कई अनुत्तरित

सवालों के जवाब का ज़िम्मेदार ?

सब जाएँगें ख़ाली कर बस्ती एक दिन।

पर ऐसे बिन बताए जाता है कौन?

बरहम….. आक्रोश, नाराज़गी जाती नहीं।

ज़वाब मिले, इतना तो मेरा हक़ बनता था।

अपनी बहती धार में

बिना मुझसे पूछे,

बिन मेरे अनुमति।

तुमने मेरे पत्थरों से

बनाया था आशियाँ अपना।

बस मैं उसे हीं वापस ले जा रही हूँ,

अपनी बहती धार में।

तब तुम शक्तिशाली थे।

आज़ मैं प्रचंड हूँ।