दर पर

राह के पत्थर

राह के पत्थरों के ठोकरों ने सिखाया,

राह-ए-ज़िंदगी पर चलना।

बुतों का इबादत किया हर दम।

फिर क्यों  फेंक दें इन पाषणों को? ,

सबक तो इन्हों ने  भी दिये कई  बार।

 

 

जिंदगी के रंग -206

कलम थामे

     लिखती उंगलियाँ आगे बढ़ती जातीं हैं।

           तब  एक जीवंत रचना उभरती हैं।

                ये उंगलियाँ संदेश हैं –

                        जिंदगी आगे बढ़ते जाने का नाम है।

                                 आधे पर रुक कर,

पंक्तियोँ…लाइनों को अधूरा छोङ कर,

       लिखे अक्षरों को आँसूअों से धुँधला कर,

                 सृजनशीलता…रचनात्मकता का अस्तित्व संभव नहीं।

                         यही पंक्तियाँ… कहानियाँ… कविताएँ,

                                   पन्नों पर उतर,

                                             आगे बढ़नें  की राहें  बन जातीं हैं। 

 

Songs of a weaver and Sufi mystic poet !

एक रस्ते पर चलती बहती जिंदगी, जब राह बदल लेती है. तब जिंदगी को और उसका सफर को देखने का एक नया नजरिया बनता है ।

कबीर और रूमी की ये पंक्तियां शायद जिंदगी की उन्हीं फलसफों की बातें करती हैं। कितनी अजीब बात है, अलग-अलग समय… काल में, अलग-अलग जगहों पर दोनों ने एक सी बातें कहीं हैं। चाहें तो इनकी बातों को आध्यात्मिकता से जोड़कर देखा सकतें हैं या इस दुनिया की बातों से जोड़कर। आपको इनमें क्या नजर आता है? आपकी बातें और विचार सादर आमंत्रित है
।We are one, Aren’t we? your thoughts are invited.

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The river that flows in you also flows in me.” 
― Kabir

When you do things from your soul,

you feel a river moving in you, a joy.”

― Rumi

चराग़-ए-रहगुज़र

रहगुज़र पर, दूसरों को

इतना भी राह ना दिखाओ.

कि अपनी हीं राह…….

अपनी ही मंज़िल भूल जाओ.

चराग़-ए-रहगुज़र खड़े

रह जाते हैं राहों में.

और कारवाँ ….राही…. गुज़र जातें हैं.

 

अर्थ –

चराग़-ए-रहगुज़र- lamp on the way.

रहगुज़रpath, road.

ज़िन्दगी के रंग -38

ज़िन्दगी बहते झरने जैसा ले चली अपने संग

हमने कहा हमें अपनी राह ना चलाओ.

हम तुम्हें अपने राह ले चलते है…..

हमें जीना है अपनी ज़िंदगी – अपनी राहों पर

ना कि किसी अौर के बनाये राह पर ….